लोड हो रहा है…लोड हुँदैछ…
Skip to main content
Yugal Shatak

Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

अवढर दानी राधे, ब्रज रस खानी राधे।

Reading 93 of 112 · Source no. 81 · Source PDF 173–174

1अवढर दानी राधे, ब्रज रस खानी राधे।

2ब्रज महरानी राधे, भज मन राधे राधे॥

3भज ब्रह्मा नित राधे, भज विष्णुहुँ नित राधे।

4भज शंकर नित राधे, भज मन राधे राधे॥

5भज सनकादिक राधे, भज जनकादिक राधे।

6भज नारदादि राधे, भज मन राधे राधे॥

7भज ब्रह्म श्याम राधे, भज ब्रज नारिन राधे।

8भज उमा रमा राधे, भज मन राधे राधे॥

9मोहति रति छवि राधे, मोहति छवि छवि राधे।

10मोहति निज छवि राधे, भज मन “कृपालु” राधे॥

11भावार्थ—श्री राधा दान करने में कभी सोच विचार नहीं करतीं,

12वे ब्रज-रस की खान हैं। श्रीराधा ब्रज की महारानी हैं। हे मेरे मन!

13तू निरन्तर राधा राधा नाम का ही गायन कर। ब्रह्मा, विष्णु एवं

14शिव भी निरन्तर राधा नाम का ही स्मरण करते हैं। सनकादि परमहंस,

15जनक जैसे ब्रह्मज्ञानी एवं नारद जैसे भक्त भी निरन्तर राधा नाम का

16स्मरण करते हैं। साकार ब्रह्मस्वरूप श्रीकृष्ण, ब्रजगोपियों एवं पार्वती

17तथा महालक्ष्मी भी श्रीराधा की उपासना करती हैं। श्री राधा की

18दिव्य रूप-माधुरी रति को तो मोहित करती ही है, साक्षात् छवि

19भी राधा की छवि पर मोहित हो जाती है। श्रीराधा भी स्वयं अपनी

20शोभा पर मोहित हो जाती हैं। “श्री कृपालुजी” कहते हैं कि हे मेरे

21मन! तू भी निरन्तर श्रीराधा का ही स्मरण कर।

Native Hindi songs and published Hindi explanations from the supplied 2005 edition. The older image-only Yugal Shatak scan remains a separate source. Supplied edition: Third edition, Sharad Purnima, 17 October 2005. Published explanation: सुश्री ब्रजकुंजरी देवी.

Source edition and PDF · Text version