लोड हो रहा है…लोड हुँदैछ…
Skip to main content
Yugal Shatak

Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

जिया नहिं जाय अब तुम बिनु राधे,

Reading 87 of 112 · Source no. 75 · Source PDF 154–155

1जिया नहिं जाय अब तुम बिनु राधे,

2कहाँ जाउँ कासोँ कहूँ, तू ही बता दे।

3तू तो सत चित आनँदघन राधे,

4तोहिं जाने माने पाये कैसे बता दे।

5माया ने भुलाया मेरा दासत्व राधे,

6यामें मेरा दोष कहा तू ही बता दे।

7मैं तो हूँ अबोध नवजात शिशु राधे,

8तू तो करुणामयी प्रेम अगाधे।

9रसिकन समुझायो तू ही मम राधे,

10माने नहिं मन याय तू ही मनवा दे।

11तू तो निज नाम में भी रह नित राधे,

12यह मम उर विश्वास दिला दे।

13भुक्ति मुक्ति वैकुण्ठ माँगूँ नहिं राधे,

14निज दासी दासी की ही दासी बना दे।

15तेरे सुख को ही सुख मानूँ नित राधे,

16ऐसी ही मेरी चित्तवृत्ति बना दे।

17मेरी सब इन्द्रिय मन बुधि राधे,

18तेरी नित सेवा माँगें ऐसी बना दे।

19मेरी ओर लखो जनि दयामयी राधे,

20तू तो है “कृपालु” बिनु हेतु कृपा दे।

21भावार्थ—भक्त श्रीराधा के असह्य विरह को न सह सकने से

22व्यथित होकर कहता है—हे श्रीराधे! अब तो तुम्हारे बिना एक

23क्षण के लिये भी जीवन धारण करना मेरे लिये अत्यन्त कठिन हो

24गया है। मैं कहाँ जाऊँ? किससे अपनी पीड़ा कहूँ? यह भी तुम

25ही बता दो। राधे! तुम्हारा स्वरूप सत् चित् आनन्दघनमय है। अतः

26मैं तुम्हें जानने में असमर्थ हूँ। बिना जाने माना कैसे जाय एवं बिना

27माने तुम्हें कोई प्राप्त भी नहीं कर सकता। राधे! मैं तुम्हारा सनातन

28दास हूँ परन्तु माया-वश मैं अपने वास्तविक स्वरूप को भूल गया।

29मैंने स्वयं को शरीर मान लिया; अतः संसार की दासता करने लगा।

30यह दोष मेरा नहीं तुम्हारी माया का है। हे राधे! मैं तुम्हारा अबोध

31नवजात शिशु हूँ, असमर्थ हूँ। हे करुणामयी! तुम तो प्रेम की अगाध

32समुद्र ही हो; अतः अपने पुत्र की स्वयं ही रक्षा करो। तुम्हारे रसिक

33भक्तों द्वारा मुझे यह ज्ञात हुआ कि एकमात्र तुम ही मेरी हो। मेरा

34हठी मन इस सत्य पर विश्वास नहीं करता तुम ही कृपा द्वारा मन

35में विश्वास जमा दो। हे राधे! तुम्हारे नाम के मध्य भी तुम्हारा

36नित्य निवास है। मेरे हृदय में ऐसी दृढ़ प्रतीति तुम ही अपनी शक्ति

37से करवा दो। राधे! मैं तुमसे ब्रह्मलोक पर्यन्त के सुख, वैकुण्ठ एवं

38मुक्ति का भी सुख नहीं चाहती। तुम यदि अपनी किसी दासी की

39भी दासी मुझे बना दोगी तो मैं संतुष्ट हो जाऊँगी। राधे! मैं सदा

40तुम्हारे सुख में अपना सुख प्रतीत करूँ, ऐसी मेरी चित्तवृत्ति कब

41बनेगी? राधे! मेरी समस्त इन्द्रियाँ, मन एवं बुद्धि निरन्तर तुम्हारी

42सेवा याचना करती रहें। हे दयामयी! मेरी तरफ न देखो। हे कृपालु!

43तुम अकारण कृपा करती हो; अतः मुझ पर भी कृपा करो।

Native Hindi songs and published Hindi explanations from the supplied 2005 edition. The older image-only Yugal Shatak scan remains a separate source. Supplied edition: Third edition, Sharad Purnima, 17 October 2005. Published explanation: सुश्री ब्रजकुंजरी देवी.

Source edition and PDF · Text version