# जिया नहिं जाय अब तुम बिनु राधे,

Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

Source ID: native-yugal-shatak-2005:yugal-shatak-2005-kirtan-075
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Book: Yugal Shatak
Source edition: 17-hi-2005; SHA-256 65e97712a464ad9a811875abe92d7ad166ef58f82c9b675cf4d010c1c940a7f7
Source PDF pages: 154–155



<a id="line-1"></a>जिया नहिं जाय अब तुम बिनु राधे,  
<a id="line-2"></a>कहाँ जाउँ कासोँ कहूँ, तू ही बता दे।  
<a id="line-3"></a>तू तो सत चित आनँदघन राधे,  
<a id="line-4"></a>तोहिं जाने माने पाये कैसे बता दे।  
<a id="line-5"></a>माया ने भुलाया मेरा दासत्व राधे,  
<a id="line-6"></a>यामें मेरा दोष कहा तू ही बता दे।  
<a id="line-7"></a>मैं तो हूँ अबोध नवजात शिशु राधे,  
<a id="line-8"></a>तू तो करुणामयी प्रेम अगाधे।  
<a id="line-9"></a>रसिकन समुझायो तू ही मम राधे,  
<a id="line-10"></a>माने नहिं मन याय तू ही मनवा दे।  
<a id="line-11"></a>तू तो निज नाम में भी रह नित राधे,  
<a id="line-12"></a>यह मम उर विश्वास दिला दे।  
<a id="line-13"></a>भुक्ति मुक्ति वैकुण्ठ माँगूँ नहिं राधे,  
<a id="line-14"></a>निज दासी दासी की ही दासी बना दे।  
<a id="line-15"></a>तेरे सुख को ही सुख मानूँ नित राधे,  
<a id="line-16"></a>ऐसी ही मेरी चित्तवृत्ति बना दे।  
<a id="line-17"></a>मेरी सब इन्द्रिय मन बुधि राधे,  
<a id="line-18"></a>तेरी नित सेवा माँगें ऐसी बना दे।  
<a id="line-19"></a>मेरी ओर लखो जनि दयामयी राधे,  
<a id="line-20"></a>तू तो है “कृपालु” बिनु हेतु कृपा दे।

Published Hindi meaning — सुश्री ब्रजकुंजरी देवी

<a id="line-21"></a>भावार्थ—भक्त श्रीराधा के असह्य विरह को न सह सकने से  
<a id="line-22"></a>व्यथित होकर कहता है—हे श्रीराधे! अब तो तुम्हारे बिना एक  
<a id="line-23"></a>क्षण के लिये भी जीवन धारण करना मेरे लिये अत्यन्त कठिन हो  
<a id="line-24"></a>गया है। मैं कहाँ जाऊँ? किससे अपनी पीड़ा कहूँ? यह भी तुम  
<a id="line-25"></a>ही बता दो। राधे! तुम्हारा स्वरूप सत् चित् आनन्दघनमय है। अतः  
<a id="line-26"></a>मैं तुम्हें जानने में असमर्थ हूँ। बिना जाने माना कैसे जाय एवं बिना  
<a id="line-27"></a>माने तुम्हें कोई प्राप्त भी नहीं कर सकता। राधे! मैं तुम्हारा सनातन  
<a id="line-28"></a>दास हूँ परन्तु माया-वश मैं अपने वास्तविक स्वरूप को भूल गया।  
<a id="line-29"></a>मैंने स्वयं को शरीर मान लिया; अतः संसार की दासता करने लगा।  
<a id="line-30"></a>यह दोष मेरा नहीं तुम्हारी माया का है। हे राधे! मैं तुम्हारा अबोध  
<a id="line-31"></a>नवजात शिशु हूँ, असमर्थ हूँ। हे करुणामयी! तुम तो प्रेम की अगाध  
<a id="line-32"></a>समुद्र ही हो; अतः अपने पुत्र की स्वयं ही रक्षा करो। तुम्हारे रसिक  
<a id="line-33"></a>भक्तों द्वारा मुझे यह ज्ञात हुआ कि एकमात्र तुम ही मेरी हो। मेरा  
<a id="line-34"></a>हठी मन इस सत्य पर विश्वास नहीं करता तुम ही कृपा द्वारा मन  
<a id="line-35"></a>में विश्वास जमा दो। हे राधे! तुम्हारे नाम के मध्य भी तुम्हारा  
<a id="line-36"></a>नित्य निवास है। मेरे हृदय में ऐसी दृढ़ प्रतीति तुम ही अपनी शक्ति  
<a id="line-37"></a>से करवा दो। राधे! मैं तुमसे ब्रह्मलोक पर्यन्त के सुख, वैकुण्ठ एवं  
<a id="line-38"></a>मुक्ति का भी सुख नहीं चाहती। तुम यदि अपनी किसी दासी की  
<a id="line-39"></a>भी दासी मुझे बना दोगी तो मैं संतुष्ट हो जाऊँगी। राधे! मैं सदा  
<a id="line-40"></a>तुम्हारे सुख में अपना सुख प्रतीत करूँ, ऐसी मेरी चित्तवृत्ति कब  
<a id="line-41"></a>बनेगी? राधे! मेरी समस्त इन्द्रियाँ, मन एवं बुद्धि निरन्तर तुम्हारी  
<a id="line-42"></a>सेवा याचना करती रहें। हे दयामयी! मेरी तरफ न देखो। हे कृपालु!  
<a id="line-43"></a>तुम अकारण कृपा करती हो; अतः मुझ पर भी कृपा करो।

Native Hindi songs and published Hindi explanations from the supplied 2005 edition. The older image-only Yugal Shatak scan remains a separate source. Supplied edition: Third edition, Sharad Purnima, 17 October 2005. Published explanation: सुश्री ब्रजकुंजरी देवी.

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Unofficial source transcription. Roman transliteration is not an English translation. No missing meanings are generated.
