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Yugal Shatak

Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

तू ही मेरी है रँगीली महल वारी।

Reading 86 of 112 · Source no. 74 · Source PDF 152–153

1तू ही मेरी है रँगीली महल वारी।

2नहिं छोडूँ पाछा तेरा प्यारी सुकुमारी।

3रसिकों ने बताया तेरी इक प्यारी।

4भोरी भारी बरसाने वारी सुकुमारी।

5तू ही मेरी गति मति रति सुकुमारी।

6बैकुंठहुँ सुख नहिं चह प्यारी।

7मोहिं दे दे वर ऐसा जासों सुकुमारी।

8दउँ नित ही बुहारी गहवर प्यारी।

9थकि जाओ जब रास महँ सुकुमारी।

10करुँ व्यजन दबाऊँ चरनन प्यारी।

11हो जो तेरी अनबन सँग बनवारी।

12नये नये चुटकुले ते हँसाउँ प्यारी।

13जेहि डगर चलन चह सुकुमारी।

14तेहि डगर बुहारी देती रहुँ प्यारी।

15जो भी सेवा तेरी गोपी कहें सुकुमारी।

16दौरि दौरि के विभोर हो के करुँ प्यारी।

17तेरे रोम रोम ब्रज रस चुवे प्यारी।

18पियें नित ब्रजनारी अरु बनवारी।

19निज ब्रज रस मोको भी पिला दे प्यारी।

20यद्यपि है “कृपालु” नहिं अधिकारी।

21भावार्थ—हे महलों में वास करने वाली सुकुमारी रँगीली राधे!

22मेरी एकमात्र अवलम्ब स्वरूपा तुम ही तो हो। हे सुकुमारी भोली-

23भाली राधे! तुम्हारे रसिकों द्वारा ही मुझे यह ज्ञात हुआ कि मेरी तो

24एकमात्र तुम ही हो। हे बरसाने ग्राम वासिनी राधे! मेरी एकमात्र

25आश्रय स्वरूपा तुम ही हो। तुम ही मेरी बुद्धि को प्रेरणा प्रदान

26करती हो। तुम ही श्रीकृष्ण-प्रेम प्रदात्री हो। राधे! मैं तुमसे वैकुण्ठ

27के सुख की याचना कदापि नहीं करती। हे सुकुमारी राधे! मैं तो

28यही वर माँगती हूँ-तुम ऐसी कृपा करो जिससे तुम्हारी लीला

29स्थलियों को स्वच्छ रखूँ। गह्वरवन में प्रतिदिन सोहनी सेवा करूँ।

30रास करते-करते जब तुम्हारा सुकुमार शरीर श्रान्त हो जावे तब मैं

31अपने हाथों से व्यजन करूँ। तुम्हारे कोमल चरणों का संवाहन कर

32थकान मिटा दूँ। जब कभी प्रियतम के साथ रस-क्रीड़ा में तुम

33प्रतिकूलता धारण करो तब नवीन-नवीन हास्य रस पूर्ण वार्ताओं

34द्वारा तुम्हारा मनोरंजन करूँ। हे प्यारी राधे! जिस-जिस मार्ग पर

35तुम्हारे चरण-तल पड़ें उसे बुहारी द्वारा स्वच्छ, करती रहूँ। तुम्हारी

36दासियों द्वारा जो भी सेवा-कार्य मुझे प्राप्त हो उसे आलस्य-रहित

37होकर प्रेमोन्मत्तता पूर्वक पूर्ण करूँ। हे राधे! तुम्हारे प्रत्येक रोम से

38ब्रज-रस की वर्षा होती रहती है, ब्रजगोपियाँ तथा श्रीकृष्ण उसका

39पान करते रहते हैं। हे मेरी प्यारी राधे! मुझे भी किसी प्रकार अपने

40ब्रजरस का पान करा दो। हे कृपालु! मैं अधिकारी तो नहीं हूँ परन्तु

41तुम कृपा द्वारा ऐसा करने में समर्थ हो।

Native Hindi songs and published Hindi explanations from the supplied 2005 edition. The older image-only Yugal Shatak scan remains a separate source. Supplied edition: Third edition, Sharad Purnima, 17 October 2005. Published explanation: सुश्री ब्रजकुंजरी देवी.

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