# तू ही मेरी है रँगीली महल वारी।

Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

Source ID: native-yugal-shatak-2005:yugal-shatak-2005-kirtan-074
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Book: Yugal Shatak
Source edition: 17-hi-2005; SHA-256 65e97712a464ad9a811875abe92d7ad166ef58f82c9b675cf4d010c1c940a7f7
Source PDF pages: 152–153



<a id="line-1"></a>तू ही मेरी है रँगीली महल वारी।  
<a id="line-2"></a>नहिं छोडूँ पाछा तेरा प्यारी सुकुमारी।  
<a id="line-3"></a>रसिकों ने बताया तेरी इक प्यारी।  
<a id="line-4"></a>भोरी भारी बरसाने वारी सुकुमारी।  
<a id="line-5"></a>तू ही मेरी गति मति रति सुकुमारी।  
<a id="line-6"></a>बैकुंठहुँ सुख नहिं चह प्यारी।  
<a id="line-7"></a>मोहिं दे दे वर ऐसा जासों सुकुमारी।  
<a id="line-8"></a>दउँ नित ही बुहारी गहवर प्यारी।  
<a id="line-9"></a>थकि जाओ जब रास महँ सुकुमारी।  
<a id="line-10"></a>करुँ व्यजन दबाऊँ चरनन प्यारी।  
<a id="line-11"></a>हो जो तेरी अनबन सँग बनवारी।  
<a id="line-12"></a>नये नये चुटकुले ते हँसाउँ प्यारी।  
<a id="line-13"></a>जेहि डगर चलन चह सुकुमारी।  
<a id="line-14"></a>तेहि डगर बुहारी देती रहुँ प्यारी।  
<a id="line-15"></a>जो भी सेवा तेरी गोपी कहें सुकुमारी।  
<a id="line-16"></a>दौरि दौरि के विभोर हो के करुँ प्यारी।  
<a id="line-17"></a>तेरे रोम रोम ब्रज रस चुवे प्यारी।  
<a id="line-18"></a>पियें नित ब्रजनारी अरु बनवारी।  
<a id="line-19"></a>निज ब्रज रस मोको भी पिला दे प्यारी।  
<a id="line-20"></a>यद्यपि है “कृपालु” नहिं अधिकारी।

Published Hindi meaning — सुश्री ब्रजकुंजरी देवी

<a id="line-21"></a>भावार्थ—हे महलों में वास करने वाली सुकुमारी रँगीली राधे!  
<a id="line-22"></a>मेरी एकमात्र अवलम्ब स्वरूपा तुम ही तो हो। हे सुकुमारी भोली-  
<a id="line-23"></a>भाली राधे! तुम्हारे रसिकों द्वारा ही मुझे यह ज्ञात हुआ कि मेरी तो  
<a id="line-24"></a>एकमात्र तुम ही हो। हे बरसाने ग्राम वासिनी राधे! मेरी एकमात्र  
<a id="line-25"></a>आश्रय स्वरूपा तुम ही हो। तुम ही मेरी बुद्धि को प्रेरणा प्रदान  
<a id="line-26"></a>करती हो। तुम ही श्रीकृष्ण-प्रेम प्रदात्री हो। राधे! मैं तुमसे वैकुण्ठ  
<a id="line-27"></a>के सुख की याचना कदापि नहीं करती। हे सुकुमारी राधे! मैं तो  
<a id="line-28"></a>यही वर माँगती हूँ-तुम ऐसी कृपा करो जिससे तुम्हारी लीला  
<a id="line-29"></a>स्थलियों को स्वच्छ रखूँ। गह्वरवन में प्रतिदिन सोहनी सेवा करूँ।  
<a id="line-30"></a>रास करते-करते जब तुम्हारा सुकुमार शरीर श्रान्त हो जावे तब मैं  
<a id="line-31"></a>अपने हाथों से व्यजन करूँ। तुम्हारे कोमल चरणों का संवाहन कर  
<a id="line-32"></a>थकान मिटा दूँ। जब कभी प्रियतम के साथ रस-क्रीड़ा में तुम  
<a id="line-33"></a>प्रतिकूलता धारण करो तब नवीन-नवीन हास्य रस पूर्ण वार्ताओं  
<a id="line-34"></a>द्वारा तुम्हारा मनोरंजन करूँ। हे प्यारी राधे! जिस-जिस मार्ग पर  
<a id="line-35"></a>तुम्हारे चरण-तल पड़ें उसे बुहारी द्वारा स्वच्छ, करती रहूँ। तुम्हारी  
<a id="line-36"></a>दासियों द्वारा जो भी सेवा-कार्य मुझे प्राप्त हो उसे आलस्य-रहित  
<a id="line-37"></a>होकर प्रेमोन्मत्तता पूर्वक पूर्ण करूँ। हे राधे! तुम्हारे प्रत्येक रोम से  
<a id="line-38"></a>ब्रज-रस की वर्षा होती रहती है, ब्रजगोपियाँ तथा श्रीकृष्ण उसका  
<a id="line-39"></a>पान करते रहते हैं। हे मेरी प्यारी राधे! मुझे भी किसी प्रकार अपने  
<a id="line-40"></a>ब्रजरस का पान करा दो। हे कृपालु! मैं अधिकारी तो नहीं हूँ परन्तु  
<a id="line-41"></a>तुम कृपा द्वारा ऐसा करने में समर्थ हो।

Native Hindi songs and published Hindi explanations from the supplied 2005 edition. The older image-only Yugal Shatak scan remains a separate source. Supplied edition: Third edition, Sharad Purnima, 17 October 2005. Published explanation: सुश्री ब्रजकुंजरी देवी.

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Unofficial source transcription. Roman transliteration is not an English translation. No missing meanings are generated.
