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Yugal Shatak

Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

कृपा करु कृपा करु कृपा करु राधे,

Reading 84 of 112 · Source no. 72 · Source PDF 148–149

1कृपा करु कृपा करु कृपा करु राधे,

2कहा घटि जाय तोरा कृपा करु राधे।

3तेरा तो है तन मन प्राण कृपा राधे,

4तू तो इक कृपा को ही दूजा रूप राधे।

5तेरा तो है एक काम कृपा कृपा राधे,

6कृपा बिनु तू तो रहि नहिं सक राधे।

7जग जाने जल मीन जीवन राधे,

8ऐसे ही कृपा तेरा जीवन राधे।

9यों तो सुर नर सब कृपा करें राधे,

10किंतु उनकी कृपा सकारण राधे।

11तू तो है अकारण कृपामयी राधे,

12दीन जन पर ही तू कृपा करे राधे।

13तेरी कृपा ते ही विधि रचें जग राधे,

14तेरी कृपा ते ही हरि पालें जग राधे।

15तेरी कृपा ते ही शिव नासें जग राधे,

16तेरी कृपा बिनु पत्ता हिले नहिं राधे।

17तेरी कृपा बिनु ब्रह्म न्यायी रहे राधे,

18तेरी कृपा ते “कृपालु” बने ब्रह्म राधे॥

19भावार्थ—हे कृपामयी राधे! मेरे ऊपर भी तो कृपा करो। मुझ

20पर कृपा करने से तुम्हारे कृपा के भंडार में कोई कमी नहीं आयेगी

21अपितु तुम्हारे यश का ही विस्तार होगा। हे राधे! तुम्हारा तन, मन,

22प्राण सब कृपा द्वारा ही निर्मित है। तुम तो कृपा का ही एक दूसरा

23स्वरूप हो। राधे! कृपा करने के अतिरिक्त अन्य कोई कार्य तुम

24नहीं कर सकतीं। कृपा किये बिना तुमसे रहा भी नहीं जाता। जिस

25प्रकार संसार में मछली जल से ही जीवित रहती है, उसी प्रकार

26कृपा ही तुम्हारा जीवन है। अर्थात् तुमने जीवन-धारण ही कृपा

27करने के लिये किया है। संसार में सुर, नर, मुनि भी कृपा करते हुए

28देखे जाते हैं परन्तु वे बिना कारण के कृपा नहीं कर सकते।

29सुर नर मुनि सबकी यह रीती। स्वारथ लागि करहिं सब

30प्रीती।सम्पूर्ण विश्व में अकारण कृपा करने वाली तो एकमात्र तुम

31ही हो। संसार में सब बने बने के ही साथी हैं परन्तु तुम्हारी कृपा

32के पात्र तो विशेषतः दीन-जन ही हैं। श्रीराधे! तुम्हारी कृपा से ही

33ब्रह्मा सृष्टि की रचना करते हैं। तुम्हारी कृपा से ही विष्णु जगत् का

34पालन करने में समर्थ होते हैं। तुम्हारी कृपा से ही शिव संसार का

35संहार करते हैं। हे श्रीराधे! तुम्हारी कृपा के बिना वृक्ष का पत्ता भी

36हिल नहीं सकता। श्रीराधे! ब्रह्म श्री कृष्ण केवल न्याय ही करते हैं

37परन्तु तुम्हारी कृपा को प्राप्त कर वे भी कृपालु बन सके।

Native Hindi songs and published Hindi explanations from the supplied 2005 edition. The older image-only Yugal Shatak scan remains a separate source. Supplied edition: Third edition, Sharad Purnima, 17 October 2005. Published explanation: सुश्री ब्रजकुंजरी देवी.

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