लोड हो रहा है…लोड हुँदैछ…
Skip to main content
Yugal Shatak

Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

हमरिहुँ सुधि लो राधे, राधे राधे राधे।

Reading 82 of 112 · Source no. 70 · Source PDF 144–146

1हमरिहुँ सुधि लो राधे, राधे राधे राधे।

2किये पाप अगनित हौं राधे,

3जनमि जनमि जग राधे, राधे राधे राधे।

4अंत न पैहौ पापन राधे,

5काल अनंतहुँ राधे, राधे राधे राधे।

6याते न्याय करहु जनि राधे,

7करहु कृपा अब राधे, राधे राधे राधे।

8न्याय करत समदर्शिहुँ राधे,

9कृपा रूप तुम राधे, राधे राधे राधे।

10जग महँ भक्त वत्सला राधे,

11नाम न प्रिय तव राधे, राधे राधे राधे।

12नाम पतित पावनि तव राधे,

13सब कहँ प्रिय लग राधे, राधे राधे राधे।

14सब जानत मोहिं तेरोइ राधे,

15झूठ मूठ कहँ राधे, राधे राधे राधे।

16अब तू झूठ मूठ को राधे,

17साँचु बना दे राधे, राधे राधे राधे।

18तू तो बिनुहिं मोल दे राधे,

19सुधा प्रेम रस राधे, राधे राधे राधे।

20मोहिं अपनो कछु सोच न राधे,

21सोच तोर मोहिं राधे, राधे राधे राधे।

22तव “कृपालु” अपयश सुनि राधे,

23सहि न जात मोहिं राधे, राधे राधे राधे॥

24भावार्थ—भक्त कहता है-हे श्रीराधे! मेरी दशा पर भी विचार

25करो। मैंने संसार में जन्म धारण कर असंख्य पाप किये। यदि तुम

26मेरी तरफ देखोगी तो अनन्त काल तक भी मेरे पापों का अन्त नहीं

27होगा। अब न्याय करने का विचार त्याग दो। केवल कृपा ही करो।

28न्याय तो समदर्शी श्रीकृष्ण भी करते हैं परन्तु तुम तो कृपा का ही

29साकार रूप हो। इस संसार में तुम्हारा “भक्त वत्सला” नाम इतना

30प्रिय नहीं है जितना “पतितपावनी”। अतः मुझे पावन बना दो।

31अभी तक तो सब झूठ में ही मुझे तुम्हारा समझते हैं, तुम अपनी

32कृपा से इस झूठ को सच करके दिखा दो। हे राधे! अमूल्य प्रेमामृत

33को तुम बिना कोई मूल्य लिये ही बाँटती हो। मुझे अपने लिये,

34किसी प्रकार की चिन्ता नहीं है—मैं तो पतित हूँ ही, अपनी शक्ति

35से तो मैं पावन बन नहीं सकता। चिन्ता तो मुझे तुम्हारी है। संसार

36में मेरे द्वारा तुम्हारा अपयश होगा। संसार कहेगा-यह राधा का

37दास है और इसकी इतनी शोचनीय दशा-आश्चर्य! हे कृपालु!

38तुम्हारे प्रति जो आक्षेप होंगे, वे मुझसे सहन नहीं होंगे।

Native Hindi songs and published Hindi explanations from the supplied 2005 edition. The older image-only Yugal Shatak scan remains a separate source. Supplied edition: Third edition, Sharad Purnima, 17 October 2005. Published explanation: सुश्री ब्रजकुंजरी देवी.

Source edition and PDF · Text version