Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
मोहिं सोच तव श्यामा, श्यामा मेरी श्यामा।
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1मोहिं सोच तव श्यामा, श्यामा मेरी श्यामा।
2कृपा करति बिनु कारण श्यामा,
3कह तुम्हरे जन श्यामा, श्यामा मेरी श्यामा।
4हमरिहिं बेर बेर क्यों श्यामा,
5इहै सोच मन श्यामा, श्यामा मेरी श्यामा।
6सब मोहिं कहत जगद्गुरु श्यामा,
7तुम जानत जस श्यामा, श्यामा मेरी श्यामा।
8हौं न जगत को गुरु हौं श्यामा,
9जगत मोर गुरु श्यामा, श्यामा मेरी श्यामा।
10गावूँ नाउँ तिहारोइ श्यामा,
11ध्यावूँ जग सुख श्यामा, श्यामा मेरी श्यामा।
12भक्ति होय मन ही ते श्यामा,
13यह जानत हौं श्यामा, श्यामा मेरी श्यामा।
14पर उपदेश कुशल हौं श्यामा,
15निज हित कुशल न श्यामा, श्यामा मेरी श्यामा।
16याते तव अपयश हो श्यामा,
17यह पछितावा श्यामा, श्यामा मेरी श्यामा।
18अब “कृपालु” मोहूँ कहँ श्यामा,
19देहु प्रेम निज श्यामा, श्यामा मेरी श्यामा॥
20भावार्थ—हे श्रीराधे! मुझे अपनी चिन्ता नहीं है, मुझे तो तुम्हारी
21चिन्ता है। संसार मुझे तुम्हारा समझता है और मेरी दशा तो अत्यन्त
22ही दयनीय है; अतः मेरे कारण कहीं तुम्हारा अपयश न हो। तुम्हारे
23भक्त जन कहते हैं कि तुम बिना कारण ही कृपा करती हो। परन्तु
24मेरे साथ देर क्यों हो रही है? मुझे यही आश्चर्य है। संसार मुझे
25जगद्गुरु कहता है परन्तु वास्तविक दशा तो तुम ही जानती हो। मैं
26जगत् का गुरु नहीं हूँ अपितु जगत् ही मेरा गुरु है। मैं मुख से तो
27तुम्हारा नाम गाता हूँ किंतु संसार के सुखों का चिंतन करता हूँ।
28यद्यपि मैं यह जानता हूँ कि भक्ति मन से ही की जाती है। हे श्री
29राधे! मैं दूसरों को हितोपदेश करने में तो कुशल हूँ परन्तु अपना
30हित-साधन करने में चतुर नहीं बन सका। मेरी ऐसी जीवन-चर्या
31से तुम्हारा अपयश होगा यही ग्लानि मुझे चिंतित कर रही है। श्री
32कृपालुजी के शब्दों में- हे श्रीराधे! अब तो एक ही उपाय है-तुम
33मुझे अपना प्रेम प्रदान करो।