Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
तू कैसी मातु हमार, निज शिशु कहँ दीन बिसार,
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1तू कैसी मातु हमार, निज शिशु कहँ दीन बिसार,
2दासी माया सुत मार, सुनु अलबेली सरकार।
3तू तो करुणा अवतार, सब पर कर कृपा अपार,
4पुनि कत निष्ठुरता धार, सुनु अलबेली सरकार।
5तू पतितन ही कर प्यार, तू पतितन की पतवार,
6हौं पतितन को सरदार, सुनु अलबेली सरकार।
7बिनु कारण तू दे प्यार, अस कह सब रसिक पुकार,
8कत बार हमारिहिं बार, सुनु अलबेली सरकार।
9तू निराधार आधार, हम निराधार सुकुमार,
10अब तो सुधि लेहु हमार, सुनु सुनु “कृपालु” सरकार।
11भावार्थ—भक्त श्रीराधा को उलाहना देता है- तुम कैसी माँ
12हो जो अपने पुत्र को भूल गई हो। हे अलबेली स्वामिनी! तुम्हारी
13दासी माया तुम्हारे अपने ही पुत्र को सता रही है। हे करुणा की
14अवतार स्वरूपिणी राधे! सभी जीवों पर तुम्हारी असीम कृपा निरन्तर
15बरस रही है फिर मेरे लिये निष्ठुरता क्यों धारण की है? हे स्वामिनी!
16तुम तो पतितजनों को ही अपनाती हो। पतितों के लिये तो तुम्हारा
17ही अवलम्ब है। मैं तो पतितों का शिरोमणि हूँ फिर मुझे अपनाने
18में विलम्ब क्यों कर रही हो? तुम्हारे रसिक जन पुकार कर कह
19रहे हैं कि तुम अकारण ही प्रेम और कृपा प्रदान करती हो फिर
20हमारी बारी आने पर विलम्ब क्यों कर रही हो! हे राधे! तुम
21निराश्रयों के लिये आश्रय स्वरूपा हो। हे सुकुमारी! हम भी
22निरवलम्ब हैं। हे कृपालु सरकार! अब तो हमारी दशा पर ध्यान
23दो।