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Yugal Shatak

Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

जिया नहिं जाय अब राधे, राधे राधे राधे।

Reading 75 of 112 · Source no. 63 · Source PDF 134–135

1जिया नहिं जाय अब राधे, राधे राधे राधे।

2तुम बिनु युग युग बीते राधे,

3पाये अति दुख राधे, राधे राधे राधे।

4रसिकन मोहिं समुझायेहु राधे,

5तव जग नहिं, तव राधे, राधे राधे राधे।

6यह भी रसिक जनायेहु राधे,

7रहति नाम मधि राधे, राधे राधे राधे।

8तब ते लेत नाम तव राधे,

9पावत रस नहिं राधे, राधे राधे राधे।

10तू तो है रस अम्बुधि राधे,

11वैसेहि नामहुँ राधे, राधे राधे राधे।

12करत नाम अपराधन राधे,

13कारण गुरु कह राधे, राधे राधे राधे।

14एक बार दिखला दे राधे,

15टुक निज झाँकी राधे, राधे राधे राधे।

16रस का चसका लगि जाय राधे,

17मन न जाय जग राधे, राधे राधे राधे।

18यदपि न हौं अधिकारी राधे,

19तदपि कृपा चह राधे, राधे राधे राधे।

20तू “कृपालु” कह रसिकन राधे,

21यह प्रतीति उर राधे, राधे राधे राधे।

22भावार्थ—हे श्रीराधे! अब तुमसे रहित होकर जीवन धारण

23करना मेरे लिये भार स्वरूप है। तुमसे दूर रहते हुए युग पर युग

24व्यतीत हो गये और मैं भाँति-भाँति के दुःख सहता रहा। रसिकों के

25संग से मुझे यह ज्ञात हुआ कि संसार मेरा नहीं है, मेरी तो एकमात्र

26तुम ही हो। रसिकों ने मुझे यह भी बताया कि तुम अपने नाम में

27नित्य निवास करती हो। मैंने इस बात का विश्वास कर तुम्हारा नाम

28गाना प्रारम्भ कर दिया किन्तु नाम के रस का आस्वादन नहीं कर

29पाता। तुम तो रस की समुद्र हो नाम भी तुम्हारे समान ही है। इसका

30कारण गुरु ने बताया-“नामापराध, नाम के सुख से वंचित रखता है”

31यदि तुम कृपा करके एक बार अपनी झलक दिखा दो तो मेरे मन

32को तुम्हारे रूप-रस का स्वाद प्राप्त हो जाये तो पुनः यह जगत् के

33विषयों से विरक्त हो जाये। यद्यपि मैं तुम्हारे दर्शनों का अधिकारी

34नहीं हूँ तथापि तुम्हारी कृपा की प्रतीक्षा करता हूँ। रसिकजन कहते

35हैं कि तुम अत्यन्त “कृपालु” हो, मुझे ऐसा विश्वास है।

Native Hindi songs and published Hindi explanations from the supplied 2005 edition. The older image-only Yugal Shatak scan remains a separate source. Supplied edition: Third edition, Sharad Purnima, 17 October 2005. Published explanation: सुश्री ब्रजकुंजरी देवी.

Source edition and PDF · Text version