Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
कैसी माँ तू श्यामा, श्यामा मेरी श्यामा।
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1कैसी माँ तू श्यामा, श्यामा मेरी श्यामा।
2हौं हौं तेरा ही सुत श्यामा,
3यह कह तव श्रुति श्यामा, श्यामा मेरी श्यामा।
4पुनि कत मोहिं भुलायेहु श्यामा,
5माँ करुणामयी श्यामा, श्यामा मेरी श्यामा।
6विष्ठा विषय खात नित श्यामा,
7भ्रमत जगत नित श्यामा, श्यामा मेरी श्यामा।
8लख चौरासी तनु धरि श्यामा,
9लह्यो दुसह दुख श्यामा, श्यामा मेरी श्यामा।
10तव दासी माया ने श्यामा,
11हर्यो ज्ञान मम श्यामा, श्यामा मेरी श्यामा।
12तनु को “मैं” माना मैं श्यामा,
13भूल्यो तुम मम श्यामा, श्यामा मेरी श्यामा।
14जग सुख है मृग जल ज्यों श्यामा,
15यह नहिं माना श्यामा, श्यामा मेरी श्यामा।
16गुरु की कृपा भई जब श्यामा,
17तब जाना अब श्यामा, श्यामा मेरी श्यामा।
18मैं हूँ अंश तिहारोइ श्यामा,
19तू मम अंशी श्यामा, श्यामा मेरी श्यामा।
20अब “कृपालु” नहिं छोडूँ श्यामा,
21पाछा तोरा श्यामा, श्यामा मेरी श्यामा।
22भावार्थ—भक्त श्रीराधा को प्रेमपूर्ण उपालम्भ देता हुआ कहता
23है-हे श्रीराधे! तुम तो जगज्जननी कहलाती हो परन्तु मुझे आश्चर्य
24होता है तुम कैसी माँ हो? तुम्हारा वेद कहता है- मैं तुम्हारा पुत्र
25हूँ। पुनः हे करुणामयी माँ श्यामा! तुमने मुझे किस प्रकार भुला
26दिया। हे राधे! मैं कब से विषयों की विष्ठा को खाता हुआ संसार
27में भटक रहा हूँ। हे राधे! मैंने चौरासी लाख शरीर धारण कर
28असहनीय दुःखों को सहन किया है। तुम्हारी दासी माया ने मेरा
29समस्त ज्ञान नष्ट कर दिया। मैंने शरीर को आत्मा मानकर शरीर के
30ही विषयों का संग्रह करने में अपना अमूल्य जीवन नष्ट कर दिया।
31मैं आत्मा के स्वरूप को भूल गया। आत्मा की आत्मा तुम हो और
32तुम्हारे द्वारा ही मुझे सच्चा सुख प्राप्त होगा, इसका ज्ञान विस्मृत हो
33गया। मैंने सांसारिक सुखों की नश्वरता को नहीं जाना। मृगतृष्णा
34के समान मेरी प्यास कभी शान्त नहीं हुई। जब गुरु की कृपा मुझे
35प्राप्त हुई तब मैं जान सका कि आत्मा की सर्वस्व तो एकमात्र तुम
36ही हो। हे राधे! मैं तुम्हारा अंश हूँ, तुम मेरी अंशी हो। हे कृपालु!
37अब जब मैंने तुम्हें अपना समझ लिया तो कदापि तुम्हारा पीछा
38नहीं छोड़ सकता।