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सेवक सेव्य सिद्धांत
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1सेवक सेव्य सिद्धांत
2इस ग्रन्थ में धर्मार्थ काम मोक्षादि से उदासीन होकर
3केवल श्रीकृष्ण सुखैक तात्पर्यमयी निष्काम भक्ति
4द्वारा सेव्य श्री कृष्ण सेवा ही जीव का परम चरम
5लक्ष्य प्रदर्शित किया गया है। भक्ति युक्त कर्म, ज्ञानादि
6का भी सम्मान किया गया है। आनंद कंद सच्चिदानंद
7श्रीकृष्ण चंद्र के सांगोपांग शास्त्रीय रूपध्यान का भी
8दिग्दर्शन कराया गया है। जो साधक के हेतु
9परमोपयोगी है।
10ब्रज रस माधुरी
11श्री कृष्ण प्रेम से ओत प्रोत संकीर्तन संग्रह है। नित्य नवीन संकीर्तन जो
12आचार्य श्री के श्री मुख से प्रेम उन्मत्त अवस्था में निःसृत होते रहते हैं, इस
13पुस्तक में संकलित कर दिये गये हैं। अभी तक रचित सभी कीर्तन दो भागों में
14प्रकाशित हैं।