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Yugal Ras

Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

रूप रूप रस राधे, राधे राधे राधे।

Reading 89 of 119 · Source no. 78 · Source PDF 160–161

1रूप रूप रस राधे, राधे राधे राधे।

2मूर्तिमान रूपहिं दे राधे,

3रूपमाधुरी राधे, राधे राधे राधे।

4मूर्तिमान रसहूँ दे राधे,

5रसहुँ सरस रस राधे, राधे राधे राधे।

6नहिं कोउ अस नर नारी राधे,

7जो न मोह लखि राधे, राधे राधे राधे।

8सब जग मोहिनि रतिहूँ राधे,

9मोहित हो लखि राधे, राधे राधे राधे।

10मदनमोहनहुँ लखि छवि राधे,

11भूलत तनु सुधि राधे, राधे राधे राधे।

12रुदन करत कहि कहि हा राधे,

13मान करति जब राधे, राधे राधे राधे।

14ब्रह्म श्यामहूँ महलन राधे,

15देत बुहारी राधे, राधे राधे राधे।

16दर्शन हित तरसत नित राधे,

17विधि हरि हर सुर राधे, राधे राधे राधे।

18करि सोरह सिँगार जब राधे,

19चलति सखिन सँग राधे, राधे राधे राधे।

20सात्विक भाव आठहूँ राधे,

21प्रकटत पिय तनु राधे, राधे राधे राधे।

22लखि “कृपालु” कह “जय हो” राधे,

23“जय हो” “जय हो” राधे, राधे राधे राधे।

24भावार्थ—श्री राधा रूप को भी रूप एवं रस को रस

25प्रदान करने वाली हैं। श्यामसुन्दर रूप एवं रस के साकार स्वरूप

26हैं परन्तु श्री राधा उन्हें भी अपनी रूप माधुरी से मोह लेती हैं।

27रस रूप रासेश्वर को रासेश्वरी राधा अत्यन्त सरस रस प्रदान

28करती हैं। विश्व में ऐसा कोई नर-नारी नहीं जो श्री राधा की

29छवि को निहार कर मोहित न हो जाय। काम की पत्नी रति

30समस्त जगत् को मोह लेती हैं, वह भी श्री राधा की अतुलनीय

31रूपराशि को निहारकर मोहित हो जाती हैं। कामदेव को मोहित

32करने में सक्षम श्री कृष्ण भी श्री राधा के सौन्दर्य पर मोहित

33होकर अपने शरीर की सुध बुध भूल जाते हैं। जब मानिनी

34राधा कभी रूठ जाती हैं तब “हा राधे” कह कहकर मदन मोहन

35कृष्ण के रंग महल में बुहारी देकर स्वयं को बड़भागी अनुभव

36करते हैं। ब्रह्मा, विष्णु एवं शिवादि देवगण श्री राधा के दर्शन

37हेतु तरसते ही रहते हैं। षोडश शृंगारयुक्त महरानी राधा का जब

38सखियों सहित आगमन होता है तब प्रियतम के दिव्य शरीर में

39आठों सात्विक भाव (स्तम्भ, स्वेद आदि)प्रकट हो जाते हैं।

40“कृपालु”कहते हैं- ऐसी गुण-गरिमामयी स्वामिनी को देखकर

41हम भी जय-जयकार कर उठते हैं।

Native Hindi songs and published Hindi explanations from the supplied 2005 edition. The older image-only Yugal Ras scan is a separate source, not the scan transcribed here. Supplied edition: Fourth edition, Sharad Purnima, 17 October 2005. Published explanation: सुश्री ब्रजकुंजरी देवी.

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