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Yugal Ras

Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

अति भोरी भारी मेरी प्यारी, प्यारी प्यारी प्यारी।

Reading 85 of 119 · Source no. 74 · Source PDF 152–154

1अति भोरी भारी मेरी प्यारी, प्यारी प्यारी प्यारी।

2विविध मणिन मंडित सिर प्यारी,

3कनक मुकुट छवि न्यारी, प्यारी प्यारी प्यारी।

4शीशफूल शोभा छवि न्यारी,

5वेणी कुसुम सँवारी, प्यारी प्यारी प्यारी।

6कजरारी अँखियन बिच प्यारी,

7काजर रेखु सँवारी, प्यारी प्यारी प्यारी।

8अति रसभरी बिलोकनि प्यारी,

9लखि वारी बनवारी, प्यारी प्यारी प्यारी।

10कानन कर्णफूल दुति प्यारी,

11नथ मोतिन लर वारी, प्यारी प्यारी प्यारी।

12बेसर झलकनि हलकनि प्यारी,

13चूनरि जरिन किनारी, प्यारी प्यारी प्यारी।

14मणि कंकण चूरिन छवि न्यारी,

15मुँदरिन दुति अति प्यारी, प्यारी प्यारी प्यारी।

16वरद हस्त मुद्रा छवि न्यारी,

17करतल मेहँदी प्यारी, प्यारी प्यारी प्यारी।

18गर हीरन हारन दुति प्यारी,

19लर मोतिन छवि न्यारी, प्यारी प्यारी प्यारी।

20नीली सारी कंचुकि प्यारी,

21मणि किंकिणि छवि न्यारी, प्यारी प्यारी प्यारी।

22पग पायल रुनझुन धुनि प्यारी,

23जब चल गति मतवारी, प्यारी प्यारी प्यारी।

24चरण मिहावरि अति अरुणारी

25अँगुरिन बिछुवनि प्यारी, प्यारी प्यारी प्यारी।

26लखि “कृपालु” मम प्यारी प्यारी

27मुर्छित गिर बनवारी, प्यारी प्यारी प्यारी।

28भावार्थ—भक्त अपनी इष्टदेवी श्री राधा के प्रति अपने

29हृदयोद्गार प्रकट करते हुए कहता है-मेरी प्यारी राधा अत्यन्त

30ही भोली भाली हैं। श्री राधा के शीश पर अनेक प्रकार की

31मणियों से जटित स्वर्ण मुकुट शोभा पा रहा है। शीशफूल नामक

32आभूषण अनूठी छवि को प्राप्त हो रहा है। सखियों द्वारा सँवारी

33हुई वेणी सुमन द्वारा गुम्फित है। सहज कजरारे नेत्रों में काजल

34की रेखा सँवारी गई है। श्री राधा के नेत्रों की रसपूर्ण चितवनि

35को निहारकर प्रियतम कृष्ण स्वयं को निछावर करते हैं। श्री

36राधा के कानों में कर्णफूल नामक आभूषण दमक रहे हैं। नासिका

37में धारण की हुई नथ के मोतियों की लड़ को निरखकर सखियाँ

38बलिहार जाती हैं। बेसर का हिल हिलकर झलमलाना बड़ा ही

39भला प्रतीत होता है। जरी के किनारे की चुनरी की शोभा भी

40न्यारी ही है। युग करों में मणियों से जड़े हुए कंकणों एवं

41चूड़ियों की अनुपम छवि दर्शनीय है। उँगलियों में अँगूठियाँ

42जगमगा रही हैं। श्री राधा के वरद हस्त-कमल की मुद्रा

43अलौकिक करुणा को विकीर्ण कर रही है। कर-तल मेहँदी की

44लालिमा से युक्त हैं। कम्बु-कण्ठ हीरों के हार की श्वेत आभा

45से युक्त है। मोतियों के हार अपना प्रकाश प्रसारित कर रहे हैं।

46नील वर्ण की साड़ी श्री राधा के गौर वर्ण पर अति सुन्दर लग

47रही है। वक्ष कंचुकी से आवृत है। सूक्ष्म कटि प्रदेश पर मणियों

48से जड़ी हुई किंकिणी शोभायमान है। चरणों में पायल की मधुर

49रुनझुन ध्वनि हो रही है। चरणों में अरुण मिहावर छवि पा रहा

50है। उंगलियों में बिछुवों की अद्भुत शोभा है।“कृपालु”कहते

51हैं- सोलह शृंगार से युक्त मेरी स्वामिनी को निरखकर श्यामसुन्दर

52मूर्च्छा को प्राप्त हो जाते हैं।

Native Hindi songs and published Hindi explanations from the supplied 2005 edition. The older image-only Yugal Ras scan is a separate source, not the scan transcribed here. Supplied edition: Fourth edition, Sharad Purnima, 17 October 2005. Published explanation: सुश्री ब्रजकुंजरी देवी.

Source edition and PDF · Text version