लोड हो रहा है…लोड हुँदैछ…
Skip to main content
Yugal Ras

Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

आज मैं सुनावूँ खोटी खरी कछु छलिया,

Reading 38 of 119 · Source no. 27 · Source PDF 65–67

1आज मैं सुनावूँ खोटी खरी कछु छलिया,

2सच लागे कडुवा जगत जाने छलिया।

3चारों वेदों में कहा है तूने यह छलिया,

4मैं हूंँ अंशी मेरे अंश जीव सब छलिया।

5कोऊ सुधा सिन्धु चाहे पूरा पिये छलिया,

6चाहे चुल्लू भर पिये फल इक छलिया।

7अंशी गुण अंश में भी रहें सब छलिया,

8पुनि तेरे गुण मुझमें न काहे छलिया।

9तू तो विभु अग जग व्यापक छलिया,

10मैं तो अणु तनु में ही व्यापक छलिया।

11तू तो पूर्ण ज्ञानमय रहे नित छलिया,

12मैं तो सर्वदा ही अल्प ज्ञानमय छलिया।

13तू तो दिव्य आनँद युत रहे छलिया,

14मैं तो अगनित दुख युत रहूँ छलिया।

15तू तो सब का ही है नियामक छलिया,

16मैं तो हूँ नियम्य तेरी माया का भी छलिया।

17तू तो माया को नचावे मायाधीश छलिया,

18मैं तो तेरी मायावश नाचूँ नित छलिया।

19तू तो है स्वतंत्र सर्वशक्ति युत छलिया,

20मैं तो परवश अल्पशक्ति युत छलिया।

21तू तो शुद्ध बुद्ध नित्य युक्त रहे छलिया,

22मैं तो कर्मबन्धन युत नित छलिया।

23यदि हूंँ मैं तेरा तो दे निज गुण छलिया,

24या तो तू “कृपालु” कहु झूठी श्रुति छलिया।

25भावार्थ—भक्त प्रेम की अटपटी भाषा में अपने इष्ट

26को उलाहना देते हुए कहता है- हे छली कृष्ण! आज मैं भी

27तुम्हें कुछ खोटी खरी सुनाने को विवश हो गया हूँ। हे श्यामसुन्दर!

28संसार भी जानता है कि सत्य बड़ा कटु होता है। तुमने चारों

29वेदो में यह घोषणा की है कि तुम अंशी हो एवं जीव तुम्हारे

30अंश हैं। कोई अमृत का पूरा समुद्र पी ले अथवा अंजली भर

31कर पिये तो फल एक ही होगा। अंशी के समस्त गुण अंश में

32भी रहते हैं। मैं तुमसे प्रश्न करता हूँ कि तुम्हारे गुण मुझमें क्यों

33नहीं हैं? तुम विभु होने के कारण सर्वत्र जग में व्यापक हो

34किंतु मैं अणु होने के कारण केवल शरीर में ही व्यापक हूँ। हे

35छलियों के शिरोमणि! तुम तो निरन्तर ज्ञान से पूर्ण रहते हो

36किंतु मैं तो सदा ही अल्प ज्ञान से युक्त हूँ। तुम सदा सर्वदा

37दिव्य आनन्द से परिपूर्ण हो और मैं निरन्तर असंख्य दुख झेल

38रहा हूँ। तुम सबके नियामक हो और मैं तुम्हारी दासी माया

39द्वारा भी शासित हो रहा हूँ। हे छल बल से परिपूर्ण श्यामसुन्दर!

40तुम मायाधीश होने के कारण माया को नचा रहे हो और मैं

41मायाधीन होने के कारण तुम्हारी माया द्वारा नचाया जा रहा हूँ।

42हे छली सम्राट! तुम सर्व शक्तिमान होने के कारण सदा स्वतन्त्र

43हो। नारद जी ने कहा कि परम स्वतन्त्र न सिर पर कोई। किंतु

44मैं अल्प शक्तियुक्त होने के कारण सर्वथा परतन्त्र हूँ। तुम सदा

45शुद्ध बुद्ध हो किंतु मैं कर्म- परवश होने के कारण बन्धन में हूँ।

46यदि तुम यह कहते हो- ““मैं तुम्हारा हूँ””““ममैवांशो जीव लोके-

47--”” (गीता)तो अपने सभी गुण मुझे भी प्रदान करो। यदि तुम

48मुझे अपने समान नहीं बना लेते हो तो फिर यह कहो कि

49तुम्हारे वेद पुराण सब झूठे हैं।

Native Hindi songs and published Hindi explanations from the supplied 2005 edition. The older image-only Yugal Ras scan is a separate source, not the scan transcribed here. Supplied edition: Fourth edition, Sharad Purnima, 17 October 2005. Published explanation: सुश्री ब्रजकुंजरी देवी.

Source edition and PDF · Text version