लोड हो रहा है…लोड हुँदैछ…
Skip to main content
Yugal Ras

Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

तू प्रियतम मैं प्यारी, प्यारी प्यारी प्यारी।

Reading 39 of 119 · Source no. 28 · Source PDF 67–69

1तू प्रियतम मैं प्यारी, प्यारी प्यारी प्यारी।

2प्राण जाँय भल पै व्रत प्यारी,

3छुटै न तो सन यारी, प्यारी प्यारी प्यारी।

4प्रियतम सेवा ही चह प्यारी,

5चाह न और हमारी, प्यारी प्यारी प्यारी।

6काहुहिँ भुक्ति मुक्ति लग प्यारी,

7मोहिं लग प्यारी यारी, प्यारी प्यारी प्यारी।

8गुण लखि प्यार न कर यह प्यारी,

9है अकाम मम यारी, प्यारी प्यारी प्यारी।

10क्षण क्षण वर्धमान यह यारी,

11जानि न सक संसारी, प्यारी प्यारी प्यारी।

12मूकास्वादनवत् यह यारी,

13कहि न सकत श्रुतिचारी, प्यारी प्यारी प्यारी।

14देना देना ही है यारी,

15लेना जान न प्यारी, प्यारी प्यारी प्यारी।

16मान न मान मोहिं तू प्यारी,

17घटै न याते यारी, प्यारी प्यारी प्यारी।

18जल जलनिधि सम है मम यारी,

19दोउ इक प्रियतम प्यारी, प्यारी प्यारी प्यारी।

20जो “कृपालु” चह पिय सुख प्यारी,

21जानु साँचु सोइ यारी, प्यारी प्यारी प्यारी।

22भावार्थ—भक्त अपने इष्ट के प्रति अपने हृदय के

23भाव प्रकट करते हुए कहता हैं- हे प्रियतम कृष्ण! तुम मेरे

24वास्तविक प्रियतम हो और मैं एकमात्र तुम्हारी ही प्रेयसी हूँ।

25मेरा यह प्रण है कि प्राण भले ही ही चले जायें परन्तु तुम्हारे

26साथ मेरा प्रेम सम्बन्ध कभी छिन्न नहीं होगा। यह प्रेयसी केवल

27तुम्हारी सेवा ही चाहती है, मेरी अपनी कोई इच्छा नहीं है।

28किसी को भुक्ति, मुक्ति अच्छी लगती होंगी परन्तु मुझे तो तुम्हारे

29प्रेम में ही सुख मिलता है। यह प्रेयसी तुमसे निष्काम प्रेम करती

30है। मेरा प्रेम तुम्हारे किसी गुण के कारण नहीं है। मेरी प्रीति के

31रहस्य को कोई भी सांसारिक व्यक्ति नहीं समझ सकता क्योंकि

32यह प्रीति प्रतिक्षण वृद्धि को प्राप्त होती है।““गुणरहितं कामनारहितं

33प्रतिक्षणवर्द्धमानम्।””(नारदभक्ति सूत्र) ““मूकास्वादनवत्”” होने

34के कारण चारों वेद इस प्रीति-रीति का वर्णन करने में असमर्थ

35हैं। ““नारद भक्ति सूत्र”” में कहा गया हैं- ““अनिर्वचनीयं

36प्रेमस्वरूपम्, मूकास्वादनवत्”” प्रेम में देना ही देना है प्रेमी कभी

37कुछ लेना नहीं चाहता। तुम भले ही मुझे अपनी प्रेयसी स्वीकार

38न करो, इससे मेरा प्रेम न्यूनता को प्राप्त नहीं होगा। जिस प्रकार

39समुद्र और समुद्र का जल अभिन्न है उसी प्रकार मैं तुमसे

40अभिन्न हूँ।“कृपालु”कहते हैं- जो प्रेयसी प्रियतम का सुख

41चाहती है उसी का प्रेम वास्तविक प्रेम है।

Native Hindi songs and published Hindi explanations from the supplied 2005 edition. The older image-only Yugal Ras scan is a separate source, not the scan transcribed here. Supplied edition: Fourth edition, Sharad Purnima, 17 October 2005. Published explanation: सुश्री ब्रजकुंजरी देवी.

Source edition and PDF · Text version