Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
का न कान तव कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।
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1का न कान तव कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।
2पतित पुकार सुनत नित कान्हा,
3भयो कहा अब कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।
4मम उर बैठि लखत नित कान्हा,
5कर्म शुभाशुभ कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।
6हौं तो तव मायावश कान्हा,
7भूलि गयो तोहिँ कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।
8मायाधीन जीव की कान्हा,
9शरण गही नित कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।
10भ्रम्यो लक्ष चौरासी कान्हा,
11योनि सदा ते कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।
12कर्म शुभाशुभ करि करि कान्हा,
13बाँध्यो आपुहिं कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।
14कबहूँ स्वर्ग लोक गये कान्हा,
15कबहुँ नरक गये कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।
16कबहुँक करि करुणा तुम कान्हा,
17दिये मनुज तनु कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।
18गुरु ने दिया ज्ञान भी कान्हा,
19तुम ही हो मम कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।
20तदपि “कृपालु” पतित मन कान्हा,
21मान पतित नहिं कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।
22भावार्थ— भक्त खीझकर श्रीकृष्ण से कहता है- हे कृष्ण!
23क्या तुम्हारे, कान नहीं हैं? तुम तो पतित-जनों की पुकार शीघ्र
24ही सुन लेते हो, अब मेरी बार क्या हो गया? मेरे हृदय में
25बैठकर तुम मेरे शुभ- अशुभ कर्मों को देखते रहते हो। मैं तो
26तुम्हारी माया द्वारा प्रेरित होकर तुम्हें भूल गया। मैंने अज्ञान के
27कारण मायाधीन जीवों की ही शरण ग्रहण की। इस कारण
28चौरासी लाख योनियों में भ्रमण करता रहा। मैंने शुभ अशुभ
29कर्म करके स्वयं ही मकड़ी के जाले की भाँति स्वयं को फँसा
30लिया। मैंने कभी स्वर्ग-लोक की यात्रा की, कभी नरक की।
31तुमने कृपा करके कभी मानव शरीर दे दिया। गुरु ने भी मुझे
32समझाया कि एकमात्र श्रीकृष्ण ही तेरे हैं। मन की मलिनता के
33कारण मुझ पतित ने यह कभी स्वीकार नहीं किया।