Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
अपना बनाया तोहिं कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।
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1अपना बनाया तोहिं कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।
2अब लौँ बनाया तनु के कान्हा,
3मात पिता सुत कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।
4सबने मीठी बातन कान्हा,
5साधा स्वारथ कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।
6स्वार्थ हानि लखतहिँ सब कान्हा,
7मित्र शत्रु बन कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।
8काल विवश पुनि तजि सब कान्हा,
9काल कवल भये कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।
10जितनो इन्द्रिय विषयन कान्हा,
11भोग्यो जग महँ कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।
12उतनोइ बढ़ी वासना कान्हा,
13ज्यों घृत आहुति कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।
14जहँ किय मनहिं सक्त अति कान्हा,
15जग महँ कतहूँ कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।
16मर कर पाव सोइ गति कान्हा,
17भव बंधनयुत कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।
18ज्ञानी भरत सरीखे कान्हा,
19हिरन सक्त भये कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।
20पायो अपर जन्म महँ कान्हा,
21देह हिरन की कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।
22नर ही सों न सुरहुँ सों कान्हा,
23करे प्रेम यदि कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।
24सोउ नश्वर दुख मिश्रित कान्हा,
25दे न साथ नित कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।
26मायाबद्ध सबै जन कान्हा,
27स्वार्थ दास रह कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।
28तू ही तो “कृपालु” इक कान्हा,
29नित्य साथ दे कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा॥
30भावार्थ—भक्त अपने इष्ट श्री कृष्ण के प्रति अपने
31हृदय के भाव प्रकट करते हुए कहता है- हे श्री कृष्ण! मैंने
32अब तुम्हें अपना बना लिया है। अभी तक तो शरीर के माता
33पिता, पुत्र आदि को ही मैं अपना समझता रहा। सांसारिक
34सम्बन्धियों ने मीठी बातों द्वारा मुझसे अपना स्वार्थ पूर्ण किया।
35तनिक भी स्वार्थ-हानि होते ही मित्र शत्रु बन गये। शारीरिक-
36सम्बंधी समयानुसार मेरा साथ त्यागकर काल के गाल में चले
37गये। पाँच इन्द्रियोें के विषय (शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध)
38जितने मैंने भोगे, उतनी ही वासना की वृद्धि होती गई, जिस
39प्रकार घृत डालने से अग्नि बढ़ती जाती है। संसार में जिसने
40जहाँ अपना मन आसक्त किया मृत्यु के उपरान्त उसे भव-
41बन्धन युक्त गति ही प्राप्त हुई। जड़ भरत जैसे ज्ञानी भी मृग-
42शावक में आसक्त होने के कारण मृग-शरीर को प्राप्त हुए।
43यदि कोई देव-योनि के किसी जीव से भी प्रेम करेगा तो उसे
44दुख -मिश्रित गति ही प्राप्त होगी क्योंकि सभी योनियों के
45जीव मायाबद्ध एवं स्वार्थ के दास हैं।““सुर नर मुनि सब कै यह
46रीती, स्वारथ लागि करहिं सब प्रीती।””भक्त कहता है- हे श्री
47कृष्ण! एकमात्र तुम ही ऐसे हो जो जीव के नित्य सखा होने के
48कारण सदा ही जीव का साथ देते हो।