Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
जाना नहिं “मैं” को मैंने कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।
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1जाना नहिं “मैं” को मैंने कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।
2मेरा तन मेरा मन मेरा धन कान्हा,
3कहत यदपि नित कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।
4जो मेरा सो मैं नहिं कान्हा,
5यह भी जानत कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।
6भई विपर्पय मति मम कान्हा,
7तव माया ते कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।
8माना तनु है “मैं” यह कान्हा,
9भई भूल यह कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।
10तनु के सुख हित निशि दिन कान्हा,
11कियो अथक श्रम कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।
12गयो स्वर्ग देखेउँ तहँ कान्हा
13सुख लवलेश न कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।
14कियो योग जप तप व्रत कान्हा,
15कहुँ सुख लेश न कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।
16अब जान्यो साधन बल कान्हा,
17कोउ न पाव सुख कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।
18साधनहीन दीन बनि कान्हा,
19जो प्रपन्न हो कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।
20माँगत दिव्य प्रेम जो कान्हा,
21शिशु जनु रो कर कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।
22वा पर कर “कृपालु” तू कान्हा,
23कृपा वृष्टि नित कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।
24भावार्थ— भक्त कहता है- हे कृष्ण! मैंने अपने
25आत्मस्वरूप को नहीं पहचाना। संसार में सब यही कहते हैं
26कि यह मेरा शरीर है, मेरा मन है, मेरा धन है। हम यह जानते
27हैं कि जो “मेरा” है वह “मैं” नहीं है तुम्हारी माया ने बुद्धि में
28भ्रम उत्पन्न कर दिया है। भूल यही हुई कि मैंने स्वयं को शरीर
29माना। आत्मा नहीं माना। स्वयं को शरीर मानने से शरीर के
30सुख के लिये ही रात-दिन परिश्रम किया। मैं अपने कर्मानुसार
31स्वर्ग भी गया परन्तु वहाँ सुख का लेश भी नहीं अनुभव किया।
32मैंने अनेक प्रकार से योग, जप, तप, व्रत आदि भी किये परन्तु
33किंचित् भी सुख प्राप्त नहीं हुआ। अब मेरी बुद्धि ऐसा मानती
34है कि अपने साधन-बल से कोई भी सुख प्राप्त नहीं कर सकता।
35जो अपने साधन-बल का अभिमान छोड़कर निरभिमानी बनकर
36तुम्हारे शरणागत हो जाता है और नवजात शिशु की भाँति करुण
37क्रन्दन करते हुए तुमसे दिव्यप्रेम की याचना करता है, उस पर
38तुम निरन्तर अपनी कृपा की वर्षा करते हो।