Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
लागी नहिं छूटे अब कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।
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1लागी नहिं छूटे अब कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।
2गुरु ने जनाया अब जाना यह कान्हा,
3तू ही मेरो साँचो यार कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।
4चाहे निज उर ते लगा ले मोहिं कान्हा,
5चाहे ठुकरा दे मोहिं कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।
6लोक जाय चाहे परलोक जाय कान्हा,
7उर ते न जाय मम कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।
8ललित त्रिभंगी छवि तन मन कान्हा,
9भाय गइ भाय गइ कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।
10चितवनि हँसनि गवनि रस कान्हा,
11इक ते इक बढ़ि कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।
12अब लौं रह्यों रंक अब कान्हा,
13पायो पारस कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।
14अपना बनाया तोहिं पिय तू कान्हा,
15अपना बना न बना कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।
16निज सुख चाहूंँ नहिं सपनेहुँ कान्हा,
17चाहूँ नित तव सुख कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।
18रवि को मिटा दे चाहे तम पै कान्हा,
19छोड़ूँ नहिं पाछा तोरा कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।
20चाहे सलिलहुँ ते निकल घृत कान्हा,
21छूटे नहिं यारी अब कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।
22उर ते निकसि जा तो जानूँ तोहिं कान्हा,
23देत चुनौती यह कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।
24चाह यह तू चाहे या न चाहे कान्हा,
25चाहा करुँ हौँ “कृपालु” कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।
26भावार्थ—भक्त भगवान् से कहता है- हे कृष्ण! मेरा
27मन तुममें अनुरक्त हो गया है, अब किसी भी प्रकार से इसे
28हटाया नहीं जा सकता। गुरु द्वारा मैंने यह ज्ञान प्राप्त किया है
29कि तुम ही मेरे सच्चे हितैषी मित्र हो। तुम मुझे चाहे अपने
30हृदय से लगाओ चाहे ठुकरा दो। मेरा लोक-परलोक सभी नष्ट
31हो जाये परन्तु तुम मेरे हृदय से न निकलना। मेरे तन-मन में
32तुम्हारी सुन्दर त्रिभंगी छवि समा गई है। तुम्हारी चितवन, तुम्हारा
33हँसना एवं तुम्हारी चाल सभी एक से एक बढ़कर हैं। अभी
34तक तुमसे अनभिज्ञ रहने के कारण गरीब था अब तुम्हें पाकर
35मुझे पारस ही प्राप्त हो गया है। मैंने तुम्हें अपना प्रियतम बना
36लिया है। तुम मुझे अपना बनाओ या न बनाओ। मैं स्वप्र में भी
37अपना सुख नहीं चाहता, सदा तुम्हारे सुख की ही कामना करता
38हूँ। तुम सर्वसमर्थ हो। अंधकार के द्वारा सूर्य के प्रकाश को
39मिटा सकते हो किंतु मैं तुम्हें नहीं छोडूंगा। जल से भले ही घृत
40निकल आवे किंतु अब मेरी और तुम्हारी मित्रता कभी समाप्त
41न होगी। तुम यदि समर्थ हो तो मेरे हृदय से निकलकर देखो मैं
42तुम्हें चुनौती दे रहा हूँ। मेरी एक ही अभिलाषा है- तुम भले ही
43मुझे प्रेम करो या न करो किंतु मैं सदा तुमसे प्रेम करूँ।