Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
तजु मनमानी मन मेरे, मेरे मेरे मेरे।
Reading 17 of 119 · Source no. 6 · Source PDF 24–26
1तजु मनमानी मन मेरे, मेरे मेरे मेरे।
2सुत वित तिय पति नहिं कोउ तेरे,
3सब स्वारथ के चेरे, मेरे मेरे मेरे।
4जो यह कहत रहत “तुम मेरे”,
5सपनेहुँ ये नहिं तेरे, मेरे मेरे मेरे।
6स्वारथ हित सब कह “तुम मेरे,
7दास बने सब तेरे, मेरे मेरे मेरे।
8लख जब स्वार्थ हानि ढिंग तेरे,
9भूलत मेरे मेरे, मेरे मेरे मेरे।
10सबै भिखारी जे कह मेरे,
11कोउ न काम के तेरे,मेरे मेरे मेरे।
12तू है हरि का, हरि हैं तेरे,
13उनहिं मान “तू मेरे, मेरे मेरे मेरे।
14वे हरि रहत सदा उर तेरे,
15बनि जा उनहिंन चेरे, मेरे मेरे मेरे।
16उर न काम रह नेकहुँ तेरे,
17ये सब माया चेरे, मेरे मेरे मेरे।
18सार “कृपालु” एक हरि तेरे,
19वचन मानु मन मेरे, मेरे मेरे मेरे।
20भावार्थ—हे मेरे मन! अब मनमानी करना छोड़ दे।
21पुत्र, धन, स्त्री-पति आदि कोई भी तेरा नहीं है। सब अपने
22स्वार्थ से ही संबंध जोड़ते हैं। जो तुझसे कहते हैं- “तुम मेरे”
23हो, वे कभी स्वप्न में भी तेरा साथ नहीं देंगे। जब तक स्वार्थ
24पूर्ति होती है तभी तक ये तेरी गुलामी करेंगे। जब किंचित् भी
25स्वार्थ-हानि होगी तब ये तुझे अपना मानना छोड़ देंगे।““सुर
26नर मुनि सबकी यह रीती, स्वारथ लागि करहिं सब प्रीती।””जिन्हें तू
27अपना समझता है वे तो स्वयं ही भिखारी हैं। वे तेरे किस काम
28आयेंगे। तू हरि का है, श्री हरि ही तेरे हैं, उन परम कृपालु श्री
29हरि को ही अपना मान। वे हरि तो सदा तेरे हृदय में ही स्थित
30हैं। तू उनका ही दास बन जा। किसी भी प्रकार की कामना को
31हृदय में स्थान ना दे। काम आदि तो माया के नौकर चाकर हैं।
32“कृपालु”कहते हैं- हे मेरे मन! मेरी बात मान। समस्त वेद
33शास्त्र एवं संतों की वाणी का यही सार है कि एकमात्र श्री हरि
34ही तेरे हैं, अन्य कोई नहीं।