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Yugal Ras

Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

को कह सम पिय प्यारी, प्यारी प्यारी प्यारी।

Reading 16 of 119 · Source no. 5 · Source PDF 22–24

1को कह सम पिय प्यारी, प्यारी प्यारी प्यारी।

2द्वै बापन वारो बनवारी,

3भानुदुलारी प्यारी, प्यारी प्यारी प्यारी।

4कारो कारो तन बनवारी,

5गोरी गोरी प्यारी, प्यारी प्यारी प्यारी।

6मोर मुकुट सिर धर बनवारी,

7कनक मुकुट सिर प्यारी, प्यारी प्यारी प्यारी।

8गुंजमाल गर बिच बनवारी,

9मोतिन लर गर प्यारी, प्यारी प्यारी प्यारी।

10कंध लकुटि नट तन बनवारी,

11सब सिँगार तन प्यारी, प्यारी प्यारी प्यारी।

12कुलिश कठोर हृदय बनवारी,

13अति कोमल उर प्यारी, प्यारी प्यारी प्यारी।

14अगनित प्यारी युत बनवारी,

15पिय अनन्य व्रत प्यारी, प्यारी प्यारी प्यारी।

16चरण पलोटत नित बनवारी,

17पलुटावति पग प्यारी, प्यारी प्यारी प्यारी।

18याचत भीख प्रेम बनवारी,

19देति भीख तेहिं प्यारी, प्यारी प्यारी प्यारी।

20ब्रजवासिन तजि गये बनवारी,

21नित्यवास ब्रज प्यारी, प्यारी प्यारी प्यारी।

22आराधक “कृपालु” बनवारी,

23आराध्या मम प्यारी, प्यारी प्यारी प्यारी।

24भावार्थ—रसिक भक्त अपनी विलक्षण रीति से श्री

25राधा की महत्ता प्रकाशित करते हैं- कौन कहता है-श्री कृष्ण

26राधा के समान हैं? कहाँ तो दो पिता (वसुदेव एवं नंद) के पुत्र

27कहलाने वाले कृष्ण एवं कहाँ भानु भूप के कुल में उत्पन्न हुई

28राजकुमारी राधा, वनों में विचरण करने वाले कृष्ण का रंग तो

29काला है, महलों में रहने वाली राधा अत्यन्त गौर वर्ण की हैं।

30कृष्ण तो वन में पड़े हुए मयूर पुच्छ को सिर पर धारण कर लेते

31हैं परन्तु श्री राधा के शीश पर स्वर्ण मुकुट सुशोभित होता है।

32कहाँ तो कृष्ण के कण्ठ में घुँघुची की माला और कहाँ भानुनन्दिनी

33के गले का बहुमूल्य मुक्ताहार! नटवर कृष्ण के कंधे पर लकुटी

34रखी है परन्तु श्री राधा तो सोलहों शृंगार से युक्त है। श्री कृष्ण

35वज्र के समान कठोर हृदय के हैं किंतु श्री राधा का हृदय तो

36अत्यन्त ही कोमल है। श्री कृष्ण बहुवल्लभ हैं। श्री राधा का

37प्रेम अनन्य है वे केवल कृष्णव्रता ही हैं। कहाँ तो सुकुमारी

38राधा के चरण दबाने वाले कृष्ण एवं कहाँ प्रियतम से चरण

39दबवाने वाली अत्यन्त गौरवमयी राधा! दोनों समान कैसे हो

40सकते हैं? श्री कृष्ण सदा श्री राधा के द्वार के प्रेम-भिक्षुक हैं।

41श्री राधा उन्हें सदैव प्रेम-दान देती हैं। श्री कृष्ण निष्ठुर बनकर

42ब्रज-वासियों को त्यागकर मथुरा एवं मथुरा से द्वारिका चले

43गये परन्तु श्री राधा तो सर्वदा ब्रज में ही निवास करती हैं“कृपालु”

44जी कहते हैं कि सबसे महत्वपूर्ण अन्तर तो दोनों में यह है कि

45श्री राधा पूर्णब्रह्म श्रीकृष्ण की आराधिका हैं। अतः दोनों समान

46नहीं हैं। श्री राधा का स्थान उच्च है।

Native Hindi songs and published Hindi explanations from the supplied 2005 edition. The older image-only Yugal Ras scan is a separate source, not the scan transcribed here. Supplied edition: Fourth edition, Sharad Purnima, 17 October 2005. Published explanation: सुश्री ब्रजकुंजरी देवी.

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