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Yugal Ras

Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

दोउ ठाकुर श्यामा श्याम, दोउ कोटि काम अभिराम।

Reading 12 of 119 · Source no. 1 · Source PDF 14–16

1दोउ ठाकुर श्यामा श्याम, दोउ कोटि काम अभिराम।

2दोउ सुखघन पूरनकाम, विहरत वृंदावन धाम॥

3दोउ प्रेम सिंधु सुखधाम, दोउ रूपसिंधु अभिराम।

4दोउ ब्रजरस सिंधु ललाम, विहरत वृंदावन धाम॥

5दोउ इक नित श्यामा श्याम, दोउ भज दोउ आठोँ याम।

6दोउ सेवत दोउ अविराम, विहरत वृंदावन धाम॥

7दोउ मोहे दोउ छविधाम, दोउ पूर्णकाम अभिराम।

8दोउ एक ब्रह्म द्वै नाम, विहरत वृंदावन धाम॥

9दोउ गावत नित दोउ नाम, दोउ ध्यावत दोउ अविराम।

10दोउ चह दोउ सुख वसु याम, विहरत वृंदावन धाम॥

11दोउ दीनबंधु सुखधाम, दोउ आप्तकाम अभिराम।

12दोउ भक्तवश्य वसु याम, विहरत वृंदावन धाम॥

13दोउ नित्यवास ब्रजधाम, दोउ करत रास अविराम।

14दोउ सँग रह नित ब्रजबाम, विहरत वृंदावन धाम॥

15दोउ रस स्वरूप अभिराम, दोउ रसिक मुकुट अभिराम।

16दोउ मधु दोउ मधुप ललाम, विहरत वृंदावन धाम॥

17दोउ तनु चिन्मय सुखधाम, दोउ अवतारी अभिराम।

18दोउ लीला दिव्य ललाम, विहरत वृंदावन धाम॥

19दोउ तनु बह रस अविराम, दोउ सम दोउ श्यामा श्याम।

20दोउ जीवनधन ब्रजबाम, विहरत “कृपालु” ब्रजधाम॥

21भावार्थ—मेरे ठाकुर श्यामा-श्याम करोड़ों कामदेवों

22से भी अधिक कमनीय हैं। दोनों ही चितघन सुखघन स्वरूप

23हैं। दोनों नित्य दिव्य वृन्दावन धाम में विहार करते हैं। दोनों

24सुख की खान हैं। प्रेम के समुद्र हैं। अभिराम श्यामा श्याम रूप

25के समुद्र हैं। दोनों ही सुन्दर ब्रजरस के सागर हैं। ऐसे दिव्य

26युगल नित्य वृन्दावन में विहार करते रहते हैं। ये श्यामा श्याम

27नित्य एक ही हैं। दोनों ही रात दिन दोनों की आराधना करते

28हैं। निरन्तर परस्पर सेवा-भावना से युक्त होकर श्री वृन्दावन

29धाम में विहार करते हैं। दोनों ही अपनी अनन्त शोभा राशि से

30दोनों को मोह लेते हैं। सुन्दर श्यामा-श्याम पूर्णकाम हैं। नाम

31मात्र के लिये ही ये दो हैं। वस्तुतः तो पूर्णब्रह्म ये दोनों एक ही

32हैं। वृन्दावन इनकी विहारस्थली हैं। निरन्तर परस्पर एक दूसरे

33के नाम का गायन करते हैं। अविरल एक दूसरे का ध्यान करते

34हैं। दोनों ही दोनों का सुख चाहते हैं। ऐसे दिव्य युगल नित्य

35वृन्दावन में विहार करते हैं। सुख की राशिस्वरूप श्यामा-श्याम

36दीनों पर कृपा करते हैं।दोनों ही आप्तकाम हैं(कामना रहित)।

37दोनों ही सदा भक्तों की भक्ति के वशीभूत रहते हैं। ऐसे अलौकिक

38स्वरूपयुक्त श्यामा-श्याम नित्य वृन्दावन में विहार करते रहते

39हैं। ब्रजमंडल में दोनों का नित्य निवास है। दोनों ही निरन्तर

40रास-रस की वर्षा करते रहते हैं। ब्रजांगनायें इन दोनों के साथ

41साथ रहकर इनकी लीला में सहायता करती हैं। ये श्यामा श्याम

42सदा वृन्दावन में विहार करते हैं। अभिराम श्यामा श्याम रस

43रूप ही हैं। दोनों ही रसिकों के भी मुकुट मणि हैं। दोनों ही

44मधु एवं मधुप भी हैं। ऐसे ललित, युगल सरकार सदा ही

45वृन्दावन में विहार करते हैं। दोनों का शरीर सुख समूह एवं

46चिन्मय है। दोनों ही अवतारी स्वरूप हैं। दोनों की लीलायें

47दिव्य एवं मनोहर हैं। ये श्यामा-श्याम सदा वृन्दावन में विहार

48करते हैं। दोनों के दिव्य शरीर से रस की धारा अनवरत प्रवाहित

49होती रहती है। दोनों के समान दोनों ही हैं। दोनों ही ब्रज-

50गोपियों के जीवन-सर्वस्व हैं। ये युगल-सरकार सदा ही वृन्दावन

51धाम को विहार-स्थली बनाते हैं।

Native Hindi songs and published Hindi explanations from the supplied 2005 edition. The older image-only Yugal Ras scan is a separate source, not the scan transcribed here. Supplied edition: Fourth edition, Sharad Purnima, 17 October 2005. Published explanation: सुश्री ब्रजकुंजरी देवी.

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