# दोउ ठाकुर श्यामा श्याम, दोउ कोटि काम अभिराम।

Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

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Book: Yugal Ras
Source edition: 16-hi-2005; SHA-256 4bb470b1f96249e40eb21d96cd2bb6b8eec203f5ed370df4843197140ad5ea16
Source PDF pages: 14–16



<a id="line-1"></a>दोउ ठाकुर श्यामा श्याम, दोउ कोटि काम अभिराम।  
<a id="line-2"></a>दोउ सुखघन पूरनकाम, विहरत वृंदावन धाम॥  
<a id="line-3"></a>दोउ प्रेम सिंधु सुखधाम, दोउ रूपसिंधु अभिराम।  
<a id="line-4"></a>दोउ ब्रजरस सिंधु ललाम, विहरत वृंदावन धाम॥  
<a id="line-5"></a>दोउ इक नित श्यामा श्याम, दोउ भज दोउ आठोँ याम।  
<a id="line-6"></a>दोउ सेवत दोउ अविराम, विहरत वृंदावन धाम॥  
<a id="line-7"></a>दोउ मोहे दोउ छविधाम, दोउ पूर्णकाम अभिराम।  
<a id="line-8"></a>दोउ एक ब्रह्म द्वै नाम, विहरत वृंदावन धाम॥  
<a id="line-9"></a>दोउ गावत नित दोउ नाम, दोउ ध्यावत दोउ अविराम।

<a id="line-10"></a>दोउ चह दोउ सुख वसु याम, विहरत वृंदावन धाम॥  
<a id="line-11"></a>दोउ दीनबंधु सुखधाम, दोउ आप्तकाम अभिराम।  
<a id="line-12"></a>दोउ भक्तवश्य वसु याम, विहरत वृंदावन धाम॥  
<a id="line-13"></a>दोउ नित्यवास ब्रजधाम, दोउ करत रास अविराम।  
<a id="line-14"></a>दोउ सँग रह नित ब्रजबाम, विहरत वृंदावन धाम॥  
<a id="line-15"></a>दोउ रस स्वरूप अभिराम, दोउ रसिक मुकुट अभिराम।  
<a id="line-16"></a>दोउ मधु दोउ मधुप ललाम, विहरत वृंदावन धाम॥  
<a id="line-17"></a>दोउ तनु चिन्मय सुखधाम, दोउ अवतारी अभिराम।  
<a id="line-18"></a>दोउ लीला दिव्य ललाम, विहरत वृंदावन धाम॥  
<a id="line-19"></a>दोउ तनु बह रस अविराम, दोउ सम दोउ श्यामा श्याम।  
<a id="line-20"></a>दोउ जीवनधन ब्रजबाम, विहरत “कृपालु” ब्रजधाम॥

Published Hindi meaning — सुश्री ब्रजकुंजरी देवी

<a id="line-21"></a>भावार्थ—मेरे ठाकुर श्यामा-श्याम करोड़ों कामदेवों  
<a id="line-22"></a>से भी अधिक कमनीय हैं। दोनों ही चितघन सुखघन स्वरूप  
<a id="line-23"></a>हैं। दोनों नित्य दिव्य वृन्दावन धाम में विहार करते हैं। दोनों  
<a id="line-24"></a>सुख की खान हैं। प्रेम के समुद्र हैं। अभिराम श्यामा श्याम रूप  
<a id="line-25"></a>के समुद्र हैं। दोनों ही सुन्दर ब्रजरस के सागर हैं। ऐसे दिव्य  
<a id="line-26"></a>युगल नित्य वृन्दावन में विहार करते रहते हैं। ये श्यामा श्याम  
<a id="line-27"></a>नित्य एक ही हैं। दोनों ही रात दिन दोनों की आराधना करते  
<a id="line-28"></a>हैं। निरन्तर परस्पर सेवा-भावना से युक्त होकर श्री वृन्दावन  
<a id="line-29"></a>धाम में विहार करते हैं। दोनों ही अपनी अनन्त शोभा राशि से  
<a id="line-30"></a>दोनों को मोह लेते हैं। सुन्दर श्यामा-श्याम पूर्णकाम हैं। नाम  
<a id="line-31"></a>मात्र के लिये ही ये दो हैं। वस्तुतः तो पूर्णब्रह्म ये दोनों एक ही  
<a id="line-32"></a>हैं। वृन्दावन इनकी विहारस्थली हैं। निरन्तर परस्पर एक दूसरे

Published Hindi meaning — सुश्री ब्रजकुंजरी देवी

<a id="line-33"></a>के नाम का गायन करते हैं। अविरल एक दूसरे का ध्यान करते  
<a id="line-34"></a>हैं। दोनों ही दोनों का सुख चाहते हैं। ऐसे दिव्य युगल नित्य  
<a id="line-35"></a>वृन्दावन में विहार करते हैं। सुख की राशिस्वरूप श्यामा-श्याम  
<a id="line-36"></a>दीनों पर कृपा करते हैं।दोनों ही आप्तकाम हैं(कामना रहित)।  
<a id="line-37"></a>दोनों ही सदा भक्तों की भक्ति के वशीभूत रहते हैं। ऐसे अलौकिक  
<a id="line-38"></a>स्वरूपयुक्त श्यामा-श्याम नित्य वृन्दावन में विहार करते रहते  
<a id="line-39"></a>हैं। ब्रजमंडल में दोनों का नित्य निवास है। दोनों ही निरन्तर  
<a id="line-40"></a>रास-रस की वर्षा करते रहते हैं। ब्रजांगनायें इन दोनों के साथ  
<a id="line-41"></a>साथ रहकर इनकी लीला में सहायता करती हैं। ये श्यामा श्याम  
<a id="line-42"></a>सदा वृन्दावन में विहार करते हैं। अभिराम श्यामा श्याम रस  
<a id="line-43"></a>रूप ही हैं। दोनों ही रसिकों के भी मुकुट मणि हैं। दोनों ही  
<a id="line-44"></a>मधु एवं मधुप भी हैं। ऐसे ललित, युगल सरकार सदा ही  
<a id="line-45"></a>वृन्दावन में विहार करते हैं। दोनों का शरीर सुख समूह एवं  
<a id="line-46"></a>चिन्मय है। दोनों ही अवतारी स्वरूप हैं। दोनों की लीलायें  
<a id="line-47"></a>दिव्य एवं मनोहर हैं। ये श्यामा-श्याम सदा वृन्दावन में विहार  
<a id="line-48"></a>करते हैं। दोनों के दिव्य शरीर से रस की धारा अनवरत प्रवाहित  
<a id="line-49"></a>होती रहती है। दोनों के समान दोनों ही हैं। दोनों ही ब्रज-  
<a id="line-50"></a>गोपियों के जीवन-सर्वस्व हैं। ये युगल-सरकार सदा ही वृन्दावन  
<a id="line-51"></a>धाम को विहार-स्थली बनाते हैं।

Native Hindi songs and published Hindi explanations from the supplied 2005 edition. The older image-only Yugal Ras scan is a separate source, not the scan transcribed here. Supplied edition: Fourth edition, Sharad Purnima, 17 October 2005. Published explanation: सुश्री ब्रजकुंजरी देवी.

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