Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
श्यामा परिभाषा · पृष्ठ 955
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1कुमार्ग परिभाषा गोविंद राधे।
2हरि ते हटा केमन जग में लगा दे॥ 11093॥
3स्वर्ग की परिभाषा गोविंद राधे।
4सत्वगुण की अति वृद्धि बता दे॥ 11094॥
5नरक की परिभाषा गोविंद राधे।
6तमोगुण की अति वृद्धि बता दे॥ 11095॥
7नातेदार परिभाषा गोविंद राधे।
8जो हरि गुरु ते ही नाता जुड़ा दे॥ 11096॥
9दरिद्र परिभाषा गोविंद राधे।
10उर में हो जगत की तृष्णा बता दे॥ 11097॥
11कृपण की परिभाषा गोविंद राधे।
12इन्द्रियों का जो नित्य दास हो बता दे॥ 11098॥
13समर्थ की परिभाषा गोविंद राधे।
14मन हरि में ही अनुरक्त हो बता दे॥ 11099॥
15लाभ की परिभाषा गोविंद राधे।
16श्रीकृष्ण निष्काम प्रेम बता दे॥ 11100॥
17हानि की परिभाषा गोविंद राधे।
18श्री कृष्ण विमुखों का संग बता दे॥ 11101॥
19ज्ञान की परिभाषा गोविंद राधे।
20जाते बढ़े नित प्रेम श्याम का बता दे॥ 11102॥
21अज्ञान परिभाषा गोविंद राधे।
22आत्मा को देह मान लेना बता दे॥ 11103॥
23साधना की परिभाषा गोविंद राधे।
24जाते हो मन बुद्धि शुद्ध बता दे॥ 11104॥