Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
श्यामा परिभाषा · पृष्ठ 954
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1शूर की परिभाषा गोविंद राधे।
2मन की वासना पै विजय बता दे॥ 11081॥
3शौच की परिभाषा गोविंद राधे।
4कर्म में अनासक्त होना बता दे॥ 11082॥
5सन्यास परिभाषा गोविंद राधे।
6सब कामनाओं का त्याग बता दे॥ 11083॥
7धन की परिभाषा गोविंद राधे।
8हरि में हो निष्काम प्रेम बता दे॥ 11084॥
9दक्षिणा परिभाषा गोविंद राधे।
10भक्ति का उपदेश देना बता दे॥ 11085॥
11विद्या की परिभाषा गोविंद राधे।
12जाते हो जीव ब्रह्म मिलन बता दे॥ 11086॥
13लज्जा की परिभाषा गोविंद राधे।
14सब पापों ते पूर्ण घृणा हो बता दे॥ 11087॥
15सुख की परिभाषा गोविंद राधे।
16जो हो दिव्य भूमा श्री कृष्ण का बता दे॥ 11088॥
17दुःख की परिभाषा गोविंद राधे।
18विषयों की मन में कामना बता दे॥ 11089॥
19पण्डित परिभाषा गोविंद राधे।
20हरि का ही निष्काम भक्त बता दे॥ 11090॥
21मूर्ख की परिभाषा गोविंद राधे।
22इन्द्रियों का ही सुख लक्ष्य बता दे॥ 11091॥
23सुमार्ग परिभाषा गोविंद राधे।
24जग ते हटा के मन हरि में लगा दे॥ 11092॥