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Radha Govind Geet Part 2

Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

सत्संग–कुसंग · पृष्ठ 951

Reading 447 of 452 · Source nos. 11056–11067 · Source PDF 454

1क्षण भर का ही गोविंद राधे।

2मत्स्यराज का था कुसंग बता दे॥ 11056॥

3क्षणिक कुसंग ते ही गोविंद राधे।

4मेरा कैसा हुआ पतन बता दे॥ 11057॥

5अग्नि की ज्वाला को गोविंद राधे।

6घृत जैसे और भी ज्वलित बना दे॥ 11058॥

7ऐसे ही मेरी भी गोविंद राधे।

8विषय वासना बढ़ गई है बता दे॥ 11059॥

9धिक्कार मुझको है गोविंद राधे।

10धिक्कार मेरे मन को बता दे॥ 11060॥

11मैं तो पूर्व में था गोविंद राधे।

12परम तपस्वी अकेला बता दे॥ 11061॥

13मत्स्य कुसंग ते तो गोविंद राधे।

14एक ते बना मैं पचास बता दे॥ 11062॥

15अब तो पचास ते भी गोविंद राधे।

16हो गया पाँच हजार बता दे॥ 11063॥

17सौभरि विरक्त हो के गोविंद राधे।

18वन में गये, की भक्ति बता दे॥ 11064॥

19याते सभी को गोविंद राधे।

20बचना सतत है कुसंग ते बता दे॥ 11065॥

21क्षण भर का कुसंग गोविंद राधे।

22अजामिल को महापापी बना दे॥ 11066॥

23क्षण का ही सत्संग गोविंद राधे।

24अजामिल को हरि धाम दिला दे॥ 11067॥

Original Hindi couplets from the supplied Part 2 edition, grouped by printed page and chapter. Native verse numbers continue at 5902 and end at 11111. Supplied edition: Fourth edition, January 2010. Publisher: Radha Govind Samiti, New Delhi.

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