Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
सत्संग–कुसंग · पृष्ठ 950
Reading 446 of 452 · Source nos. 11044–11055 · Source PDF 453
1बनि गये सौभरि गोविंद राधे।
2सुन्दर नवल किशोर बता दे॥ 11044॥
3महल के रक्षक गोविंद राधे।
4सौभरि को सँग ले गये बता दे॥ 11045॥
5पचासों कन्यायें गोविंद राधे।
6एक साथ मोहित हो गईं बता दे॥ 11046॥
7सब एक दूसरे ते गोविंद राधे।
8लड़ने लगीं हम वरेंगे बता दे॥ 11047॥
9तब सौभरि ने गोविंद राधे।
10सबते कर लिया ब्याह बता दे॥ 11048॥
11सौभरि ने निज गोविंद राधे।
12तनु भी बनाया पचास बता दे॥ 11049॥
13निज योग बल ते गोविंद राधे।
14भोग सामग्री बनायी बता दे॥ 11050॥
15मांधाता तो थे गोविंद राधे।
16सप्त द्वीप पृथिवी अधीश बता दे॥ 11051॥
17सौभरि ऐश्वर्य गोविंद राधे।
18लखि मांधाता लज्जित बता दे॥ 11052॥
19सौभरि के समक्ष गोविंद राधे।
20उनका वैभव फीका बता दे॥ 11053॥
21सौभरि चिरकाल गोविंद राधे।
22भोगते रहे सब भोग बता दे॥ 11054॥
23एक दिन बैठे बैठे गोविंद राधे।
24सोचा मन सौभरि ने बता दे॥ 11055॥