Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
सत्संग–कुसंग · पृष्ठ 949
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1तेरे पचास कन्या गोविंद राधे।
2एक कन्या मोको दे दे बता दे॥ 11032॥
3राजा ने सोचा मन गोविंद राधे।
4ना दूँ तो दे दें शाप बता दे॥ 11033॥
5दूँ भी तो कैसे दूँ गोविंद राधे।
6बूढ़े तपी को कन्या बता दे॥ 11034॥
7अन्त में सोचा यह गोविंद राधे।
8स्वयंवर ही समीचीन है बता दे॥ 11035॥
9कहा मान्धाता ने गोविंद राधे।
10सौभरि तपस्वी ते तुरत बता दे॥ 11036॥
11पचास कन्या में गोविंद राधे।
12जो भी वरे आपको ले लें बता दे॥ 11037॥
13सौभरि समझ गये गोविंद राधे।
14मुझ वृद्ध को कोउ वरे ना बता दे॥ 11038॥
15बाल पके सिर काँपे गोविंद राधे।
16तनु अति जर्जर हुआ है बता दे॥ 11039॥
17याही ते मान्धाता गोविंद राधे।
18देना न चाहें निज कन्या बता दे॥ 11040॥
19स्वयंवर तो है गोविंद राधे।
20मना करने का बहाना बता दे॥ 11041॥
21सौभरि ने योग बल गोविंद राधे।
22ऐसा बनाया निज रूप बता दे॥ 11042॥
23जिसे लखि उर्वशी भी गोविंद राधे।
24मोहित हो जाये तुरत बता दे॥ 11043॥