Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
सत्संग–कुसंग · पृष्ठ 948
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1नरक दिला दे भल गोविंद राधे।
2हरि गुरु विमुखनि संग ना दे ना दे॥ 11020॥
3सत्संगयुत दे दे गोविंद राधे।
4नरक, कुसंगयुत इन्द्र पद ना दे॥ 11021॥
5करो चिरकाल तक गोविंद राधे।
6सत्संग तो लाभ कछु हो बता दे॥ 11022॥
7किन्तु कुसंग ऐसा गोविंद राधे।
8क्षण भर का भी सर्वनाश करा दे॥ 11023॥
9एक थे तपस्वी गोविंद राधे।
10नाम था उनका सौभरि बता दे॥ 11024॥
11सौभरि यमुना में गोविंद राधे।
12डुबकी लगा के तप करते बता दे॥ 11025॥
13जल के भीतर गोविंद राधे।
14देखा मुनि सौभरि ने बता दे॥ 11026॥
15एक मत्स्यराज निज गोविंद राधे।
16पत्नियों ते करे रमण बता दे॥ 11027॥
17मत्स्यराज सुख लखि गोविंद राधे।
18सोचा मन सौभरि ने बता दे॥ 11028॥
19हम भी एक बाला ते गोविंद राधे।
20करेंगे अपना विवाह बता दे॥ 11029॥
21नृप मान्धाता के गोविंद राधे।
22कन्या पचास अति सुन्दरी बता दे॥ 11030॥
23नृप मान्धाता ते गोविंद राधे।
24सौभरि ने कहा जाके बता दे॥ 11031॥