Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
सत्संग–कुसंग · पृष्ठ 947
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1पुण्य कर्म संग स्वर्ग गोविंद राधे।
2पाप कर्म संग तो नरक दिला दे॥ 11008॥
3हरि हरिभक्त संग गोविंद राधे।
4दिव्य चिन्मय हरि धाम दिला दे॥ 11009॥
5हरि हरिभक्त संग गोविंद राधे।
6दिव्य नित्य परमानन्द दिला दे॥ 11010॥
7कोटि भुक्ति मुक्ति सुख गोविंद राधे।
8ब्रज रसिकों केसंग सुख पै लुटा दे॥ 11011॥
9“कु” का संग त्यागे बिनु गोविंद राधे।
10“सु” का संग होगा नहिं मन को बता दे॥ 11012॥
11भक्ति यदि चाहो तो गोविंद राधे।
12विषय विषयी संग त्याग करा दे॥ 11013॥
13हरि भक्ति अतिरिक्त गोविंद राधे।
14जो कुछ है सब विषय बता दे॥ 11014॥
15संग के दो प्रकार गोविंद राधे।
16एक विषयी एक भक्त बता दे॥ 11015॥
17विषयी संग तजु गोविंद राधे।
18भक्त का संग करु हरि ते मिला दे॥ 11016॥
19स्वर्ग अपवर्ग सुख गोविंद राधे।
20मिलि सत्संग सुख सम ना बता दे॥ 11017॥
21सत्संग सम सुख गोविंद राधे।
22भुक्ति मुक्ति बैकुण्ठ का ना बता दे॥ 11018॥
23सत्संग ही दे नित गोविंद राधे।
24कबहुँ कुसंग ना दे ना दे ना दे ना दे॥ 11019॥