Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
सत्संग–कुसंग · पृष्ठ 946
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1किसी भी रूप में गोविंद राधे।
2मिले जो कुसंग करो त्याग बता दे॥ 10996॥
3वह अंजन कैसा गोविंद राधे।
4आँख ही जाते फूटे बता दे॥ 10997॥
5हरि गुरु चर्चा ही गोविंद राधे।
6सुने और ज्ञान ना सुने ना सुना दे॥ 10998॥
7अवगुण एक बस गोविंद राधे।
8हरि गुरु तजि मन जग में लगा दे॥ 10999॥
9इन्द्रिय संग व्यर्थ गोविंद राधे।
10मन का ही संग सच्चा संग बता दे॥ 11000॥
11मायापुर संग तजु गोविंद राधे।
12कान्हपुर वालों का संग करा दे॥ 11001॥
13या तो करो भक्त संग गोविंद राधे।
14या तो अकेले करो साधना बता दे॥ 11002॥
15किसी भी दशा में तुम गोविंद राधे।
16हरि विमुखों का संग करो ना बता दे॥ 11003॥
17शुद्ध शक्ति का संग गोविंद राधे।
18कैसा भी हो है श्रेय बता दे॥ 11004॥
19अशुद्ध शक्ति संग गोविंद राधे।
20कैसा भी हो है त्याज्य बता दे॥ 11005॥
21भक्त का जीवन गोविंद राधे।
22चार दिन का भी है स्तुत्य बता दे॥ 11006॥
23अभक्त जीवन गोविंद राधे।
24कल्प कल्प का भी है निंद्य बता दे॥ 11007॥