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Radha Govind Geet Part 2

Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

सत्संग–कुसंग · पृष्ठ 944

Reading 440 of 452 · Source nos. 10972–10983 · Source PDF 447

1सबते बड़ा शत्रु गोविंद राधे।

2अपना ही मनमाना मन है बता दे॥ 10972॥

3सबते बड़ा मित्र गोविंद राधे।

4गुरु शरणापन्न मन है बता दे॥ 10973॥

5सबते बड़ा है गुण गोविंद राधे।

6होके अनन्य मन हरि में लगा दे॥ 10974॥

7सब ते बड़ा है लाभ गोविंद राधे।

8हरि अरु हरिजन संग बता दे॥ 10975॥

9सन्त मन का रह गोविंद राधे।

10बारह मास बसन्त बता दे॥ 10976॥

11आज है बसन्त मन गोविंद राधे।

12हंसगुण सन्तों का संग करा दे॥ 10977॥

13सबते बड़ा अवगुण गोविंद राधे।

14नास्तिक जन का कुसंग बता दे॥ 10978॥

15“कु” का अर्थ मायिक गोविंद राधे।

16संग अर्थ मन का लगाव बता दे॥ 10979॥

17हरि ते विमुख “कु” है गोविंद राधे।

18मन का हो संग कुसंग बता दे॥ 10980॥

19सत्संग या कुसंग गोविंद राधे।

20जैसा संग वैसा रंग लाये बता दे॥ 10981॥

21थोड़ा थोड़ा प्यार करे गोविंद राधे।

22थोड़ा सा कुसंग वाको पतन करा दे॥ 10982॥

23सन्त का संग करे गोविंद राधे।

24कुसंग ते भी बचे सर्वदा बता दे॥ 10983॥

Original Hindi couplets from the supplied Part 2 edition, grouped by printed page and chapter. Native verse numbers continue at 5902 and end at 11111. Supplied edition: Fourth edition, January 2010. Publisher: Radha Govind Samiti, New Delhi.

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