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Radha Govind Geet Part 2

Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

संकीर्तन · पृष्ठ 939

Reading 436 of 452 · Source nos. 10940–10951 · Source PDF 442

1हरि विरहाग ऐसी गोविंद राधे।

2सत्व, रज, तम तीनों गुणों को मिटा दे॥ 10940॥

3तीन ताप काहे तपे गोविंद राधे।

4ताप विरह हरि ताप को मिटा दे॥ 10941॥

5पापों ते डरो जनि गोविंद राधे।

6हरि विरहाग सब पाप को जला दे॥ 10942॥

7हरि विरहाग तपि गोविंद राधे।

8मन रूपी सोना निज चमक बढ़ा दे॥ 10943॥

9हरि विरहाग ऐसी गोविंद राधे।

10मन शुद्ध करि शुद्ध प्रेम दिला दे॥ 10944॥

11धन्य सोई उर गोविंद राधे।

12जा उर हरि विरहाग लगा दे॥ 10945॥

13हरि विरहाग ऐसी गोविंद राधे।

14हरि को भी मिलने की प्यास बढ़ा दे॥ 10946॥

15हरि विरहाग ऐसी गोविंद राधे।

16हरि को भी आने को विवश करा दे॥ 10947॥

17हरि वियोग ताप में जो गोविंद राधे।

18नहीं तपा वाय जन्म व्यर्थ है बता दे॥ 10948॥

19हरि का वियोग तो है गोविंद राधे।

20सूर्य सम तापक प्रकाशक बता दे॥ 10949॥

21पंखहीन पक्षी ज्यों गोविंद राधे।

22माता हित व्याकुल रहते बता दे॥ 10950॥

23छोटे गोवत्स ज्यों गोविंद राधे।

24माँ-दुग्ध हित व्याकुल हों बता दे॥ 10951॥

Original Hindi couplets from the supplied Part 2 edition, grouped by printed page and chapter. Native verse numbers continue at 5902 and end at 11111. Supplied edition: Fourth edition, January 2010. Publisher: Radha Govind Samiti, New Delhi.

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