Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
संकीर्तन · पृष्ठ 940
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1परदेशी पति हित गोविंद राधे।
2नारी जैसे रहे व्याकुल बता दे॥ 10952॥
3ऐसे कृष्ण हम भी गोविंद राधे।
4दर्शन को तेरे व्याकुल हों बता दे॥ 10953॥
5हरि हैं बिकाऊ ले ले गोविंद राधे।
6मोल परम व्याकुलता बता दे॥ 10954॥
7जल बिनु मीन जैसी गोविंद राधे।
8तलफनि उर हो तो हरि ते मिला दे॥ 10955॥
9इक पल युग लगे गोविंद राधे।
10हरि ते मिले बिनु हरि ते मिला दे॥ 10956॥
11हरि ते मिले बिनु गोविंद राधे।
12रहा नहिं जाये सोई प्रेम बता दे॥ 10957॥
13हरि बिनु एक पल गोविंद राधे।
14कलप लगे तो जानो प्रेम बता दे॥ 10958॥
15हरि बिनु पलक का गोविंद राधे।
16उलटा लगे तो हरि दरस दिखा दे॥ 10959॥
17हरि तेरे उर में है गोविंद राधे।
18व्याकुलता वाय प्रकट करा दे॥ 10960॥
19हरि सर्वत्र सम गोविंद राधे।
20व्याप्त मंदिर में ना अधिक बता दे॥ 10961॥
21सोचे हरि दूर हैं तो गोविंद राधे।
22दूर, सोचे पास तो हैं पास बता दे॥ 10962॥
23द्रौपदी ने पूछा कृष्ण गोविंद राधे।
24तुम इतनी देर में आये क्यों बता दे॥ 10963॥