Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
संकीर्तन · पृष्ठ 938
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1लाक्षा समान मन गोविंद राधे।
2विरह के ताप मन लाख पिघला दे॥ 10928॥
3विरह में पिघला मन गोविंद राधे।
4श्यामरंग में हो एकमेक बता दे॥ 10929॥
5द्रवीभूत मन महँ गोविंद राधे।
6श्यामा श्याम का रंग मिला दे॥ 10930॥
7नाम गुण गाते रहो गोविंद राधे।
8सुनें न सुनें यह चिंता हटा दे॥ 10931॥
9देर ते जो आवें तेरे गोविंद राधे।
10बुरा जनि मानो कहो और विरहा दे॥ 10932॥
11हरि का वियोगी कहे गोविंद राधे।
12जिऊँ कैसे मरुँ कैसे कोई बता दे॥ 10933॥
13अब तो लगन लागी गोविंद राधे।
14जले न बुझे न ऐसी अगन बता दे॥ 10934॥
15लागी तो बुरी बला है गोविंद राधे।
16छूटे न छुटाये चाहे जान गवाँ दे॥ 10935॥
17उर लागी आग ऐसी गोविंद राधे।
18जितनी बुझाओ आग उतनी बढ़ा दे॥ 10936॥
19हरि विरहाग ऐसी गोविंद राधे।
20पंचक्लेश पंचकोश को भी जला दे॥ 10937॥
21हरि विरहाग ऐसी गोविंद राधे।
22द्वन्द्व को मिटा के निर्द्वन्द्व बना दे॥ 10938॥
23हरि विरहाग ऐसी गोविंद राधे।
24संचित पुण्य पाप भस्म करा दे॥ 10939॥