Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
संकीर्तन · पृष्ठ 930
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1श्रीकृष्ण भक्ति करो गोविंद राधे।
2अन्य देवों का करो आदर बता दे॥ 10832॥
3निंदा तो जनि करो गोविंद राधे।
4काउ की मन को सदोष बना दे॥ 10833॥
5ध्यानयुक्त हरि नाम गोविंद राधे।
6कीर्तन ते हरि कृपा हो बता दे॥ 10834॥
7चित्त एक दर्पण गोविंद राधे।
8उस पर मैल वासना का बता दे॥ 10835॥
9हरि नाम कीर्तन गोविंद राधे।
10चित्तदर्पण मैल शुद्ध करा दे॥ 10836॥
11संसार दावाग्नि गोविंद राधे।
12जीवों को नित्य त्रिताप जला दे॥ 10837॥
13हरिनाम कीर्तन गोविंद राधे।
14ऐसा त्रिताप ताप आप बुझा दे॥ 10838॥
15सब नर नारी हैं गोविंद राधे।
16जग जंगल के वृक्ष ज्यों बता दे॥ 10839॥
17स्वार्थ संघर्ष ते गोविंद राधे।
18सब के लगी आग उर में बता दे॥ 10840॥
19हरि नाम कीर्तन गोविंद राधे।
20उस उर आग को भी आपु बुझा दे॥ 10841॥
21जीव का कल्याण गोविंद राधे।
22है कुमुदिनी के समान बता दे॥ 10842॥
23हरि नाम कीर्तन गोविंद राधे।
24वह कुमुदिनी उत्फुल्ल करा दे॥ 10843॥