Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
लीला माधुरी · पृष्ठ 916
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1ब्रजांगनाओं की गोविंद राधे।
2पदरज को धरुँ सिर पै बता दे॥ 10690॥
3बार बार उनको ही गोविंद राधे।
4करुँ मैं प्रणाम कर जोरि बता दे॥ 10691॥
5इमि श्री ऊधो जी गोविंद राधे।
6प्रेम में भये सराबोर बता दे॥ 10692॥
7नन्द बाबा आदि गोविंद राधे।
8गोप बोले ऊधो ते बता दे॥ 10693॥
9हम सब चाहें यह गोविंद राधे।
10मन रहे सदा ही कृष्ण में बता दे॥ 10694॥
11उन्हीं की सेवा में गोविंद राधे।
12मन की एक एक वृत्ति हो बता दे॥ 10695॥
13हमारी वाणी भी गोविंद राधे।
14करे कृष्ण का गुणगान बता दे॥ 10696॥
15हमारा देह भी गोविंद राधे।
16करे बार बार प्रणाम बता दे॥ 10697॥
17भुक्ति मुक्ति चाहें नहिं गोविंद राधे।
18सदा कृष्णपद रहे प्रेम बता दे॥ 10698॥
19चाहे जिस योनि में गोविंद राधे।
20जन्म हो प्रेम नहिं छूटे बता दे॥ 10699॥
21कृष्ण की माया तो गोविंद राधे।
22ब्रह्मादिकों का ज्ञान भुला दे॥ 10700॥
23याते कृपा ही ते गोविंद राधे।
24जीव माया ते छूटे बता दे॥ 10701॥