Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
लीला माधुरी · पृष्ठ 915
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1जैसे अनजाने में गोविंद राधे।
2पी ले सुधा हो अमर बता दे॥ 10678॥
3कृष्ण ने जैसा रस गोविंद राधे।
4रास का दिया गोपियों को बता दे॥ 10679॥
5वह कमला को भी गोविंद राधे।
6रास रस मिला नहिं नेकहूँ बता दे॥ 10680॥
7मैं तो श्रीकृष्ण ते गोविंद राधे।
8बार बार यह वर माँगूँ बता दे॥ 10681॥
9वृन्दावन की गोविंद राधे।
10कुंज की लता पता मोय बना दे॥ 10682॥
11जाते गोपियों की गोविंद राधे।
12पद रज उड़ि परे तनु पै बता दे॥ 10683॥
13जिनको छोड़ना गोविंद राधे।
14कठिन है योगी जनों को बता दे॥ 10684॥
15उन स्वजनों को भी गोविंद राधे।
16त्याग दिया गोपीजनों ने बता दे॥ 10685॥
17लोक वेद मर्यादा गोविंद राधे।
18कुलमर्यादा दिया त्याग बता दे॥ 10686॥
19औरों की बात क्या गोविंद राधे।
20श्रुतियाँ ढूँढ़ें पद गोपिका बता दे॥ 10687॥
21लक्ष्मी पूजें जिन्हें गोविंद राधे।
22विधि हरि हर धरें ध्यान बता दे॥ 10688॥
23उन्हीं श्रीकृष्ण को गोविंद राधे।
24गोपियों ने बाँधा प्रेम में बता दे॥ 10689॥