Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
लीला माधुरी · पृष्ठ 908
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1आत्मा तो माया अरु गोविंद राधे।
2माया के कार्यों ते भिन्न बता दे॥ 10594॥
3आत्मा का स्पर्श गोविंद राधे।
4तीनों गुण कर सकें ना बता दे॥ 10595॥
5माया की वृत्तियाँ हैं गोविंद राधे।
6जाग्रत स्वप्न सुषुप्ति बता दे॥ 10596॥
7स्वप्न में दीखें ज्यों गोविंद राधे।
8विविध पदार्थ प्रत्यक्ष ज्यों बता दे॥ 10597॥
9ऐसे ही जाग्रत में गोविंद राधे।
10इन्द्रियों के विषय मिथ्या बता दे॥ 10598॥
11तजि दे विषय सब गोविंद राधे।
12एक मात्र मुझमें मन को लगा दे॥ 10599॥
13जैसे नदी सब गोविंद राधे।
14घूमि फिरि जायें अन्त सिन्धु में बता दे॥ 10600॥
15ऐसे सब साधनायें गोविंद राधे।
16मेरी प्राप्ति में समाप्त हों बता दे॥ 10601॥
17सब का सच्चा फल गोविंद राधे।
18मेरा साक्षात्कार बता दे॥ 10602॥
19कृष्ण ने कहा मैं गोविंद राधे।
20तुम सब का ध्रुव तारा बता दे॥ 10603॥
21मैं तुम सबका गोविंद राधे।
22हूँ जीवन सर्वस्व बता दे॥ 10604॥
23फिर भी मैं तुमते गोविंद राधे।
24जान बूझ कर रहुँ दूर बता दे॥ 10605॥