Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
लीला माधुरी · पृष्ठ 904
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1कारे कारे कपटी हों गोविंद राधे।
2कागा निज सुत पिक ते पलवा दे॥ 10546॥
3काक बलि खाके भी गोविंद राधे।
4काक संग दाता को घेरे बता दे॥ 10547॥
5कारे कारे कपटी हों गोविंद राधे।
6कृष्ण ज्ञान देने ऊधो को पठा दे॥ 10548॥
7कोई भी काली वस्तु गोविंद राधे।
8अब हम सब नहिं चाहें बता दे॥ 10549॥
9सबरे कारे बुरे गोविंद राधे।
10सदा ते थे सदा रहेंगे बता दे॥ 10550॥
11यदि तू यह कहे गोविंद राधे।
12ऐसा है तो वाय भुला दे॥ 10551॥
13कैसेहुँ छूटे ना गोविंद राधे।
14उसके रस का चसका बता दे॥ 10552॥
15चाह कर भी हम गोविंद राधे।
16चर्चा छोड़ नाहीं सकते बता दे॥ 10553॥
17कृष्ण रस का जो गोविंद राधे।
18कण भी अनुभव कर ले बता दे॥ 10554॥
19वह जग तजि बनि गोविंद राधे।
20भिक्षुक माँगे भीख बता दे॥ 10555॥
21लोक परलोक नसे गोविंद राधे।
22फिर भी न छोड़े चर्चा बता दे॥ 10556॥
23जैसे हिरनियाँ गोविंद राधे।
24व्याध गान ते हों मुग्ध बता दे॥ 10557॥