Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
लीला माधुरी · पृष्ठ 878
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1विरह का गोपी प्रेम गोविंद राधे।
2मिलन के रुक्मिणी प्रेम को हरा दे॥ 10239॥
3मिलन न माँगो कोऊ गोविंद राधे।
4प्रेम माँगो प्रेम वाय दास बना दे॥ 10240॥
5मिलन न माँगो कोऊ गोविंद राधे।
6उनकी ही इच्छा को इच्छा बना दे॥ 10241॥
7मिलन विरह युक्त गोविंद राधे।
8ब्रज का ब्रजरस होता है बता दे॥ 10242॥
9गोपियाँ सुनीं जब गोविंद राधे।
10श्याम राम मथुरा जायेंगे बता दे॥ 10243॥
11अक्रूर आये हैं गोविंद राधे।
12कंस दूत बनि के लेने बता दे॥ 10244॥
13गोपियाँ विकल भईं गोविंद राधे।
14वह विकलता लखि जाये ना बता दे॥ 10245॥
15किसी गोपी की गोविंद राधे।
16चलने लगी उष्ण श्वास बता दे॥ 10246॥
17किसी गोपी की गोविंद राधे।
18ओढ़नी गिरी नाहिं ध्यान बता दे॥ 10247॥
19किसी गोपी के गोविंद राधे।
20ढीले हुये जूड़े नहिं भान बता दे॥ 10248॥
21किसी गोपी की गोविंद राधे।
22चित्तवृत्ति हो गई बन्द बता दे॥ 10249॥
23किसी गोपी को गोविंद राधे।
24बाह्य जगत सुधि भूली बता दे॥ 10250॥