Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
लीला माधुरी · पृष्ठ 877
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1हरि योगमाया तो गोविंद राधे।
2हरि का वियोग दुख सहन करा दे॥ 10227॥
3श्याम मिलन सुख गोविंद राधे।
4स्वर्ग की सुधा को भी छोटा बना दे॥ 10228॥
5श्याम विरह दुख गोविंद राधे।
6कालकूट विष को भी छोटा बना दे॥ 10229॥
7विरह कालकूट सम गोविंद राधे।
8किन्तु सुधा ते भी सरस बता दे॥ 10230॥
9संयोग फल तो है गोविंद राधे।
10बाहर मिले भीतर खोये बता दे॥ 10231॥
11वियोग फल तो है गोविंद राधे।
12भीतर मिले बाहर खोये बता दे॥ 10232॥
13एक ही काल में हो गोविंद राधे।
14कृष्ण वियोग योग योग बता दे॥ 10233॥
15श्याम संयोग में तो गोविंद राधे।
16माहात्म्य का विस्मरण हो बता दे॥ 10234॥
17श्याम वियोग में तो गोविंद राधे।
18माहात्म्य का रह स्मरण बता दे॥ 10235॥
19विरह में गोपी कह गोविंद राधे।
20हम जानती हैं तुम ब्रह्म हो बता दे॥ 10236॥
21मिलन बढ़ावे मद गोविंद राधे।
22विरह तो प्रेमी को दीन बना दे॥ 10237॥
23मिलन ते विरह श्रेष्ठ गोविंद राधे।
24विरह तो क्षण क्षण प्रेम बढ़ा दे॥ 10238॥