Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
लीला माधुरी · पृष्ठ 874
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1गंगा समर्थ जैसे गोविंद राधे।
2निम्न जल मिले रहे शुद्ध बता दे॥ 10191॥
3किन्तु असमर्थ तो गोविंद राधे।
4मन ते भी अधर्म सोचे ना बता दे॥ 10192॥
5यदि कोई मूर्ख गोविंद राधे।
6ऐसा पाप कर्म करे नाश हो बता दे॥ 10193॥
7शिव पै हालाहल गोविंद राधे।
8विष का प्रभाव कछु हुआ ना बता दे॥ 10194॥
9अन्य कोइ विष पीता गोविंद राधे।
10तो जल कर भस्म होता बता दे॥ 10195॥
11समर्थ लोगों का गोविंद राधे।
12आदेश है माननीय बता दे॥ 10196॥
13उनका आचरण गोविंद राधे।
14कहीं कहीं अनुकरणीय बता दे॥ 10197॥
15समर्थ उपदेश गोविंद राधे।
16अनुसार आचरण ग्राह्य बता दे॥ 10198॥
17समर्थ लोग तो गोविंद राधे।
18अहंकारहीन ही होवें बता दे॥ 10199॥
19शुभ कर्म करने में गोविंद राधे।
20उनका न कछु हो स्वार्थ बता दे॥ 10200॥
21अशुभ कर्म ते भी गोविंद राधे।
22उनकी न कछु हो हानि बता दे॥ 10201॥
23समर्थ लोग तो हैं गोविंद राधे।
24शुभाशुभ कर्मों ते परे ही बता दे॥ 10202॥