Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
लीला माधुरी · पृष्ठ 872
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1चित्त बिनु हाथ पैर गोविंद राधे।
2सब हो गये कर्महीन बता दे॥ 10167॥
3अंतिम परीक्षा में भी गोविंद राधे।
4गोपियाँ हुईं उत्तीर्ण बता दे॥ 10168॥
5फिर क्या था कृष्ण ने भी गोविंद राधे।
6गोपियों केसाथ किया रास बता दे॥ 10169॥
7रास अलौकिक दिव्य गोविंद राधे।
8सर्वथा अनिर्वचनीय बता दे॥ 10170॥
9पुनः कृष्ण हो गये गोविंद राधे।
10रास ते अन्तर्धान बता दे॥ 10171॥
11निर्धन धन पावै गोविंद राधे।
12पुनि धन नासै धन प्यास बढ़ा दे॥ 10172॥
13ऐसे रास महँ श्याम गोविंद राधे।
14दै के विरह गोपी प्रेम बढ़ा दे॥ 10173॥
15गोपियाँ भईं विकल गोविंद राधे।
16सब मिलि गाईं गोपी गीत बता दे॥ 10174॥
17पुनि प्रकटे कृष्ण गोविंद राधे।
18दिया रास का रस दिव्य बता दे॥ 10175॥
19गोपियाँ न जान पायीं गोविंद राधे।
20रास में करोड़ों रूप कृष्ण के बता दे॥ 10176॥
21कृष्ण सत्य संकल्प गोविंद राधे।
22उनकी लीलायें चिन्मयी बता दे॥ 10177॥
23शुक ने सुनाया जब गोविंद राधे।
24रास लीला राजा को बता दे॥ 10178॥