Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
लीला माधुरी · पृष्ठ 871
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1जैसे नारायण गोविंद राधे।
2मुमुक्षु को अपनाते बता दे॥ 10155॥
3वैसे ही तुम भी गोविंद राधे।
4हम सब को अपना लो बता दे॥ 10156॥
5आप धर्मात्मा ने गोविंद राधे।
6कहा पति पुत्रादि सेवा बता दे॥ 10157॥
7पति पुत्रादि के भी गोविंद राधे।
8आत्मा तुम्हीं हो यह वेद बता दे॥ 10158॥
9यह है अपर धर्म गोविंद राधे।
10हम सब मानें पर धर्म बता दे॥ 10159॥
11परधर्म तो एक गोविंद राधे।
12आप की शरण जाना ही बता दे॥ 10160॥
13तुम हो महेश्वर गोविंद राधे।
14हमें ना भुलावो हम जानें बता दे॥ 10161॥
15सर्वधर्म मूल तुम गोविंद राधे।
16सबके हो गति आश्रय भी बता दे॥ 10162॥
17गोपियों ने कहा तुमने गोविंद राधे।
18चित्त तो चुराया हम सबका बता दे॥ 10163॥
19चित्त की तिजोरी में गोविंद राधे।
20धैर्य लज्जा ज्ञान धर्म रत्न थे बता दे॥ 10164॥
21चित्त बिनु हम गोपी गोविंद राधे।
22प्राण बिनु जैसे हों शव सों बता दे॥ 10165॥
23चित्त बिनु घर जाके गोविंद राधे।
24इन्द्रियों ते कर्म कैसे करें हम बता दे॥ 10166॥