Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
लीला माधुरी · पृष्ठ 861
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1गोपी प्रेम महिमा है गोविंद राधे।
2भगवान ते भी मन बनवा दे॥ 10035॥
3शुक सनकादिक गोविंद राधे।
4जनकादिक आत्माराम थे बता दे॥ 10036॥
5भगवान कृष्ण भी हैं गोविंद राधे।
6आत्माराम किन्तु भेद बता दे॥ 10037॥
7भगवान कृष्ण ने तो गोविंद राधे।
8सनकादिक मन मोहा बता दे॥ 10038॥
9गोपीप्रेम ने तो गोविंद राधे।
10भगवान कृष्ण मन मोहा बता दे॥ 10039॥
11वस्तुतस्तु गोपीप्रेम गोविंद राधे।
12भगवान की परिभाषा मिटा दे॥ 10040॥
13गोपियों की इच्छा तो गोविंद राधे।
14भगवान की भी रास इच्छा बना दे॥ 10041॥
15प्रेमियों की इच्छा का गोविंद राधे।
16प्रियतम करें अनुसरण बता दे॥ 10042॥
17गोपियाँ देह प्राण गोविंद राधे।
18हरि हित धारण किये थीं बता दे॥ 10043॥
19गोपियों का खाना पीना गोविंद राधे।
20सोना जागना कृष्ण हेतु था बता दे॥ 10044॥
21गोपियों की गति मति गोविंद राधे।
22तनु शृंगार कृष्ण हेतु था बता दे॥ 10045॥
23गोपियों की चर्या तो गोविंद राधे।
24छिन छिन श्रीकृष्ण मनन बता दे॥ 10046॥