Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
लीला माधुरी · पृष्ठ 862
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1गोपियों का देह मन गोविंद राधे।
2बुद्धि प्राण सब कृष्ण हेतु बता दे॥ 10047॥
3गोपियाँ थी पूर्णकाम गोविंद राधे।
4श्यामा श्याम भी थे पूर्ण काम बता दे॥ 10048॥
5जैसे भगवान की थी गोविंद राधे।
6रमण कामना विरोधी बता दे॥ 10049॥
7ऐसे ही गोपियों की गोविंद राधे।
8रमण कामना विरोधी बता दे॥ 10050॥
9भुक्ति मुक्ति लाँघ कर गोविंद राधे।
10गोपियों का प्रेम था कृष्ण में बता दे॥ 10051॥
11गोपी चह हरि सुख गोविंद राधे।
12हरि चह गोपियों का सुख त्यों बता दे॥ 10052॥
13मोहिनी शक्ति द्वारा गोविंद राधे।
14हरि को भी पैदा हुई प्यास बता दे॥ 10053॥
15स्वेच्छा ते ज्यों कोई गोविंद राधे।
16भाँग पी केआपु मोहित हो बता दे॥ 10054॥
17हरि का तो सर्व कर्म गोविंद राधे।
18जीव कल्याण हित ही हो बता दे॥ 10055॥
19सृष्टि या रासलीला गोविंद राधे।
20सब में है कृष्ण की करुणा बता दे॥ 10056॥
21“क्वेमाः स्त्रियः” श्लोक गोविंद राधे।
22भाव वस्तु है फल अपना बता दे॥ 10057॥
23भाव तो था काम ही का गोविंद राधे।
24कृष्ण आलम्बन दिव्य था बता दे॥ 10058॥