Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
लीला माधुरी · पृष्ठ 857
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1गोपीजन प्रेम देखो गोविंद राधे।
2ब्रह्म को भी “दारी के” गारी सुना दे॥ 9987॥
3प्रेम की विचित्र गति गोविंद राधे।
4कभु गुणगान कभू गारी सुना दे॥ 9988॥
5प्रिय सुख हित गारी गोविंद राधे।
6देती थीं गोपीजन क्रोध ना बता दे॥ 9989॥
7“दारी के” गारी मीठी गोविंद राधे।
8ब्रज नारी इक बार और सुना दे॥ 9990॥
9निलज निपट कह गोविंद राधे।
10“चल हट लम्पट” फिर ते सुना दे॥ 9991॥
11जाकी स्तुति करे वेद गोविंद राधे।
12वाको गोपी निलज निपट बतला दे॥ 9992॥
13ज्ञानी की समाधि तजि गोविंद राधे।
14ब्रज घर घर गारी खाय बता दे॥ 9993॥
15भाये न श्रुति स्तुति गोविंद राधे।
16भाये “दारी के” गारी ब्रज की बता दे॥ 9994॥
17भाये न लक्ष्मी पूजा गोविंद राधे।
18भाये राधारानी के चरण दबा दे॥ 9995॥
19नागरी के सिर पै गोविंद राधे।
20गागरी उठाई टुक छाछ ही पिला दे॥ 9996॥
21ब्रह्म माँगे छाछ टुक गोविंद राधे।
22गोपी कहे परे हट नेकु छाछ ना दे॥ 9997॥
23श्याम कहे “मेरी प्यारी” गोविंद राधे।
24गोपी कहे चलु हट अँगुठा दिखा दे॥ 9998॥