Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
लीला माधुरी · पृष्ठ 855
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1कृष्ण ने कहा पार्थ गोविंद राधे।
2गोपी तनु राखें मम हित ही बता दे॥ 9963॥
3ब्रज गोपी जन गोविंद राधे।
4देना ही जानें माँगें कछु ना बता दे॥ 9964॥
5कृष्ण कहें अर्जुन ते गोविंद राधे।
6मेरी महिमा जानें गोपियाँ बता दे॥ 9965॥
7मेरी सेवा मेरी श्रद्धा गोविंद राधे।
8मेरे उर भाव जानें गोपियाँ बता दे॥ 9966॥
9अतएव गोपियाँ तो गोविंद राधे।
10मेरी हैं सब कछु सार बता दे॥ 9967॥
11गोपी प्यार चोरी चोरी गोविंद राधे।
12रु क्मिणी प्यार खुल्लम खुल्ला बता दे॥ 9968॥
13गोपी प्यार जार जैसा गोविंद राधे।
14रुक्मिणी प्यार तो स्वकीया बता दे॥ 9969॥
15ब्रह्म श्याम पूर्णकाम गोविंद राधे।
16गोपी प्रेम वाहू मन काम बना दे॥ 9970॥
17आत्माराम श्याम को भी गोविंद राधे।
18ब्रज गोपी-प्रेम गोपीराम बना दे॥ 9971॥
19गोपियों का चित्त तो गोविंद राधे।
20कृष्ण में अनन्य भाव युक्त था बता दे॥ 9972॥
21किन्तु कृष्ण का चित्त गोविंद राधे।
22अगणित भक्त में विभक्त था बता दे॥ 9973॥
23याते था गोपियों का गोविंद राधे।
24प्रेम तो अखण्ड अनन्त बता दे॥ 9974॥